यह फैसला का अंत नहीं है निर्भया, तेरे कातिल तो अभी भी जिंदा हैं!

यह फैसला का अंत नहीं है निर्भया, तेरे कातिल तो अभी भी जिंदा हैं!

ये सिर्फ निर्भया की जीत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद निर्भया के साथ देश की हर महिला जीती है. ऐसा इसलिए क्योंकि 16 दिसंबर 2012 की रात उसके साथ जो दरिंदगी हुई थी, उसका दर्द हर महिला महसूस कर सकती है.

यही वजह है कि निर्भया के उस दर्द की हमदर्द हर वो महिला बनी, जिसने उस दर्दनाक खबर को पढ़ा, सुना या देखा था. यही वजह थी कि पूरे देश ने एक सुर में उस बर्बर घटना की निंदा की. लोगों का गुस्सा, उनकी नाराजगी दिल्ली के इंडिया गेट से लेकर मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया तक दिखी.

विरोध की आवाज इतनी ताकत से उठी कि तब की सोती सरकार भी हड़बड़ाकर जाग उठी. इसके बाद सरकार, सिस्टम और उसको बनाने-चलाने वाले लोग जितना कर सकते थे, सबने अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाई.

ये और बात है कि हम इतना कुछ करके भी निर्भया को बचा नहीं पाए. पीछे जाकर बीती बातें कुरेदने से निर्भया लौटकर नहीं आ सकती, लेकिन अब देश की तरफ से उसको एक श्रद्धांजलि जरूर मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उसके गुनहगारों की फांसी की सजा बराकरार रखी है. लेकिन अभी भी निर्भया को सच्ची श्रद्धांजलि मिलनी बाकी है. और ये तभी हो पाएगा जब देश में एक भी निर्भया नहीं रहेगी.

निर्भया चली गई लेकिन उसने देश की कानून व्यवस्था को हिला कर रख दिया. पूरे देश को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या ऐसे जघन्य अपराध में शामिल नाबालिग वाकई में नाबालिग कहे जाने चाहिएं? क्या उनके साथ नाबालिग जैसा बर्ताव होना चाहिए?

इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए जस्टिस वर्मा कमेटी बनी, जिसने रिकॉर्ड समय के भीतर अपनी रिपोर्ट भी जमा की. इसके बाद नए कानून भी बने. निर्भया के नाम पर सरकार ने बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए अलग से फंड बनाया, जिसका नाम निर्भया फंड रखा गया. लेकिन इस फंड को सही तरीके से खर्च करने के लिए सरकार शायद एक और निर्भया कांड के इंतजार में बैठी है.

दिल्ली महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में रोजाना 6 रेप होते हैं.

ये उस दिल्ली की कड़वी सच्चाई है जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और तमाम मंत्री रहते हैं. ये उस दिल्ली की कहानी है जहां की सुरक्षा व्यवस्था सबसे चाक-चौबंद मानी जाती है. ये उस दिल्ली की कहानी है जहां इंसाफ का सबसे बड़ा मंदिर सुप्रीम कोर्ट है. लेकिन उसी दिल्ली में हर रोज़ 6 निर्भया बनती हैं. देश के बाकी राज्यों में ऐसी कितनी वारदात होती होगी, इसका अंदाजा कोई भी बहुत आसानी से लगा सकता है.

बावजूद इसके सरकार बलात्कार पीड़ितों की मदद के लिए बने 1000 करोड़ के निर्भया फंड की पूरी रकम तक नहीं खर्च कर पाती. हालांकि सभी दल इस फंड की आड़ लेकर सियासी निशाने साधने से नहीं चूकते.

ये तो हुई निर्भया फंड पर जारी राजनीति की बात. अब जरा इस फंड से जुड़े तथ्यों को देख लीजिए. निर्भया फंड बनाने का ऐलान साल 2013 के आम बजट में किया गया था. ये एक नॉन लैप्सेबल फंड है जिसे सरकार सालाना 1000 करोड़ रुपये देती है.

इस फंड को मिली रकम साल खत्म होने पर शून्य नहीं होती बल्कि अगले बजट में मिलने वाले एक हज़ार करोड़ रुपये में जुड़ जाती है. देश के महिला और बाल कल्याण मंत्रालय को ये जिम्मेदारी दी गई कि इस फंड को कब, कहां और कैसे खर्च करना है, इसका खाका अलग-अलग मंत्रालयों, विभागों और राज्यों से सलाह-मशवरा करके बनाए.

मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद नवंबर 2015 में इस फंड को खर्च करने के लिए एक कमेटी बनाई गई. दिसंबर 2016 तक 7 बार इस कमेटी की बैठक हुई. 18 योजनाओं के आवेदन आए, जिनमें 16 को मंजूरी दी गई. लेकिन ये सारी योजनाएं मिलकर भी एक हज़ार करोड़ रुपये का इस्तेमाल नहीं कर पाईं.

देश की राजधानी दिल्ली में 6 निर्भया रोज बनने को मजबूर हैं, लेकिन उनको कैसे बचाना है? कैसे दोबारा बसाना है? उनकी जरुरतें क्या है? केंद्र और दिल्ली की सरकारें साढ़े तीन साल में इसका खाका तक नहीं तैयार कर पाईं. कमोबेश देश के ज्यादातर राज्यों का भी यही हाल है. ये हाल तब है जब देश में एक राष्ट्रीय महिला आयोग है और सभी राज्यों में राज्य महिला आयोग.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ये संस्थाएं केवल नाम के लिए चल रही हैं? या सिर्फ सियासी नियुक्तियों का अड्डा बनकर रह गई हैं? 1990 में बने राष्ट्रीय महिला आयोग का मकसद यही था कि वो सरकार को सुझाव दे कि महिलाओं के लिए क्या कानून होने चाहिए, उनसे जुड़ी दिक्कतों निदान कैसे संभव है? ताकि सरकार उस पर कानून ला सके, लेकिन ये काम न के बराबर ही हुआ. केंद्र में सरकार बदलने के साथ राष्ट्रीय महिला आयोग का अध्यक्ष तो बदल जाता है, लेकिन उसके काम करने का तरीका नहीं.

निर्भया फंड को कैसे खर्च करना है, इस पर एक महत्वकांक्षी योजना खुद महिला और बाल कल्याण मंत्रालय की थी. जिसके तहत बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए वन स्टॉप सेंटर बनाए जाने थे.

इस सेंटर में बलात्कार पीड़ित महिलाओं की काउसिंलिंग से लेकर पुलिस की मदद, शिकायत दर्ज कराने से लेकर डॉक्टरी मदद- सब एक ही जगह करने की योजना थी. लेकिन महिला और बाल कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश भर में ऐसे सिर्फ 79 सेंटर ही खुल पाए हैं.

इस तरह के सेंटर से कितनी पीड़िताओं को मदद पहुंची, इसके आंकड़े हैं ही नहीँ. वैसे कागजों पर मंत्रालय ने ऐसे 600 सेंटर बनाने का प्रस्ताव रखा है. निर्भया के दुनिया से जाने के बाद हर साल दिसंबर के महीने में निर्भया कांड की बरसी मनाई जाती है. हर साल किसी न किसी योजना की शुरुआत की जाती है. ऐसी ही एक योजना के तहत बसों में महिलाओं की सुविधा के लिए पैनिक बटन लगाना अनिवार्य किया गया था.

उस योजना का क्या अंजाम हुआ ये कोई नहीं जानता. हालांकि बस चलाने के नाम पर राजस्थान रोडवेज की कुछ बसों में पायलट परियोजना के तौर पर इसकी शुरुआत जरूर की गई थी. इसी तरह 2016 में सरकार ने जब निर्भया कांड की बरसी मनाई तो हरियाणा के करनाल शहर से महिला पुलिस वॉलंटियर बनाने की अच्छी शुरुआत की गई.

इनका काम समाज और पुलिस के बीच सूत्रधार का है. हर राज्य में इसकी शुरुआत होनी थी, लेकिन अभी तक किसी दूसरे राज्य से ऐसी कोई खबर नहीं आई है. निर्भया कांड दिल्ली में हुआ था और इस मुद्दे पर दिल्ली में राजनीति भी खूब हुई. दिल्ली की मौजूदा अरविंद केजरीवाल सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर सरकारी बस में सीसीटीवी लगाने और महिला मार्शल तैनात करने का वादा किया था.

लेकिन इस वादे की हकीकत किसी से छिपी नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने कर्तव्य की याद जरूर आई.

न जाने ऐसी कितनी योजनाएं निर्भया के नाम पर सिर्फ़ सरकारी फाइलों में जिंदा है. और रोज देश के हर शहर में सैकड़ों लड़कियां निर्भया की मौत मर रही हैं. इसीलिए जब तक देश में एक भी निर्भया है, तब तक हम नहीं कह सकते कि दिल्ली की निर्भया को इंसाफ मिल गया.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह जैसे गुनहगारों को तो मौत की सजा मिली है, मगर देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग नामों से ऐसे दरिंदे आज भी जिंदा हैं. आज जरुरत है समाज में रह रहे ऐसे सभी दरिंदों को सजा- ए- मौत सुनाने की.

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