तारापीठ की तारा माँ

तारापीठ की तारा माँ

maa-tara-of-tarapith#पटना-हावड़ा लूप रेल लाईन पर #झारखंड-पश्चिम_बंगाल की सीमा पर #रामपुर हाट स्टेशन के निकट पूर्वोत्तर #भारत का एक महत्वपूर्ण #शक्तिपीठ स्थित है जहां #बिहार, #बंगाल, #पश्चिम_बंगाल सहित देश के कोने-कोने से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालू-भक्तगण आकर #आद्या_देवी को अपनी श्रद्धा-भक्ति निवेदित करते हैं।

यह जाग्रत स्थान है ‘तारापीठ’-जहां विराजती हैं परम् कल्याणी, जगत् तारिणी, एकजटा भवानी व नील सरस्वती के नामों से पूजित तारा माँ। शक्ति स्वरूपा तारा माँ ममतायी हैं तथा भक्तों के कष्ट क्लेश हरण कर उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं। यही कारण है भक्तों की इनके प्रति अपार श्रद्धा है। तारा माँ का विग्रह पारम्परिक बांग्ला रीति से निर्मित भव्य मंदिर में विराजमान हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तारा माँ की प्रथम आराधना वशिष्ट मुनि के द्वारा की गयी थी। इस कारण इन्हें वशिष्ट आराधित तारा कहकर भी संबोधित करते हैं। गुरू वशिष्ट का मंदिर माँ के मंदिर के पास श्मशान भूमि पर अवस्थित है। माँ तारा की शिलामयी मूर्ति बगल की द्वारिका नदी में बहकर आई थी जो मुख्य मंदिर में स्थापित है जिसके उपर माँ की चांदी से निर्मित मुख-मुद्रा आवेष्ठित है। प्रतिदिन रात्रि में माँ की शिलामयी मूर्ति के दर्शन की व्यवस्था है जिसके लिये भक्तों की लम्बी कतारें लगती हैं। गुरु वशिष्ट द्वारा आराधित होने के कारण तारापीठ की मान्यता एक सिद्ध तंत्र पीठ के रूप में भी है और यहां दूर-दूर से तांत्रिक लोग आकर तंत्र-साधना करते हैं।

माँ तारा के परम् भक्त-साधक बामदेव का उल्लेख किये बिना माँ की चर्चा अधूरी मानी जाती है। तारा माँ की साधना में बामदेव इतने विह्वल हो जाते थे कि अपनी सुध-बुध खो जाते थे जिसके कारण लोग इन्हें ‘खेपा’अर्थात पागल कहकर संबोधित करते थे। आज वे बामा खेपा कहकर ही पुकारे जाते हैं। अपनी साधना से बामदेव ने परम् सिद्धि प्राप्त की थी और कहते हैं कि माँ तारा उन्हें दर्शन दिया करती थी। बामदेव के साथ उनके प्रिय कुत्ते कालू की भी कई कहानियां तारापीठ में प्रचलित हैं। यह बामाखेपा की भक्ति की ही शक्ति है मुख्य मंदिर परिसर में उनका मंदिर भी स्थित है और तारा माँ के साथ उनकी भी पूजा की जाती है। यहां बामदेव के साथ उनके प्रिय कुत्ते कालू की भी मूर्ति स्थापित है। तारापीठ के निकट ही आटला ग्राम में बामदेव की जन्मभूमि है। दर्शनार्थी वहां भी जाते हैं।

feetतारा मंदिर से सटे ही एक पुरातन पोखर है जो ‘जीवंतो पुखुर’अर्थात जीवंत पोखर कहलाता है। दंत-कथा है कि पुराने समय में एक सौदागर के मृत पुत्र को इस पोखर में स्नान कराने से जीवित हो गया था। इस पोखर का जल अत्यंत पवित्र माना जाता है और कई श्रद्धालू पूजा करने के पूर्व इसमें स्नान करते हैं।

यूं तो प्रति दिन तारापीठ में बड़ी संख्या में भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। पर दुर्गापूजा की एकादशी व काली पूजा के अवसरों पर भक्तों की अपार भीड़ रहती है। प्रत्येक शनि-रवि के दिन भी बड़ी संख्या में दर्शनार्थी आते हैं। तारा माँ को जबा और नील के फूल अत्यंत प्रिय लगते हैं। इस कारण लोग प्रसाद के साथ माँ को जबा व नील फूलों की माला और कमल पुष्प श्रद्धा से चढ़ाते हैं। मंदिर जाने के मार्ग में इन फूलों की दर्जनों दूकानें हैं। काली पूजा के अवसर पर तारा माँ का स्मरण-दर्शन आनंदप्रदाई व फलकारक है।

कैसे जायेंः पटना-हावड़ा लूप रेल लाईन की सभी ट्रेनों के ठहराव रामपुरहाट स्टेशन पर है। यहां उतरकर सड़क मार्ग से तारापीठ पहुंचा जा सकता है जो कि करीब 8 किमी दूर है। ऐसे तारापीठ के नाम से एक स्टेशन भी है। सड़क-मार्ग से दुमका (झारखंड)अथवा सिउड़ी (पश्चम बंगाल) होकर भी आसानी से तारापीठ पहुंच जा सकता है।

कहां ठहरेंः तरापीठ एक धार्मिक स्थान के साथ खूबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में बंगाल सरकार द्वारा विकसित किया गया है। यहां आलीशान होटल से लेकर साधारण-मध्यम हर बजट के आरामदायक होटल हैं।

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लेखक –   शिव शंकर सिंह पारिजात 

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