सिल्क सिटी में मेयर-उपमेयर के क्राउन में अब पता चलेगा सोना कितना खरा सोना है..

सिल्क सिटी में मेयर-उपमेयर के क्राउन में अब पता चलेगा सोना कितना खरा सोना है..

सिल्क सिटी में मेयर और उपमेयर के ताज( क्राउन) को लेकर कैटफाईटिंग है। नजारा दिलचस्प है। सबसे बड़ा खेल तो तिजोरी का है जो किसकी बादशाहत होगी तय करने में कामयाब होगी।

भागलपुर का अतीत तो कम से कम यही संकेत अब तक देता रहा है। धन-बल के आगे कभी कम पढ़े-लिखे मेयर दीपक भुवानियां ने पीएचडी की डिग्री और उंची तालीम हासिल की हुयी डॉ प्रीति शेखर को इस शह-मात के खेल में पटखनी दे दी थी। लक्ष्मी जीत गयी थी और सरस्वती हार गयी थी। लेकिन मौजूदा डेमोक्रेटिक सिस्टम ने कुछ ऐसी बाजी पलटी कि इस बार मेयर दीपक भुवानियां चुनावी अखाड़े से ही हो गये बाहर। फिलहाल राजधानी पटना में अपनी पसंदीदा तंबाकु रजनीगंधा और तुलसी को चबा-चबा कर अपने हिसाब का समीकरण बिठा रहे हैं। चांदी के कटोरे में अब भी दूध रोटी खाने वाले दीपक भुवानियां हालांकि राजनैतिक दांव-पेंच में माहिर खिलाडी रहे हैं, बेंगलोर में सिल्क के बिजनेस में अगल से बादशाहत है। रिकार्ड आंकडे करोडो के टर्नओवर का है। सत्ता जदयू की है तो वे जदयू से अब भी जुड़े हैं।

सारांष यह है कि सत्ता की मदमस्ती और नशे में पूरी तरह डूबे और रुपये के खेल-तमाशे का जीता-जागता सजीव नमूना। अब 4 साल बाद सत्ता का वही खेल। वही स्वरुप। फर्क इसी इतना है कि इस बार इस अखाडे में राजेश वर्मा हैं। सोने-चांदी और हीरे -जवाहरातों के दुकान के मालिक। हरिओम ज्वेलर्स इनके दुकान का नाम है। मतलब साफ है जब अर्थतंत्र चुनाव जीतती है तो सत्ता का केंद्र उस पर झुक जाता है। लाजिमी है अगर राजेश वर्मा हरिओम ज्वेलर्स के मालिक नहीं होते कोई आम वास्तिविक समाजसेवी होते जिसके जेब में पैसे की तिजोरी नहीं होती तो वे पूरे चुनावी खेल से बाहर होते। लेकिन पैसे और बाहुबल के खेल से सिल्कसिटी की आवाम अवगत है। यही सिल्क सिटी का सच है। इसमें दोष पैसे का होना और नहीं होना को नहीं दिया जा सकता। पैसे के खेल की नियति और करिश्मा लोगों ने 4 साल भुगता। उल्टापुल के नजदीक बजबजाती नालियां शहर की आज तक शोभा बढा रही है। बस एक संतोष है कि सिल्कसिटी को स्मार्ट सिटी का तमगा लग गया। लेकिन शहर के लोग कितने स्मार्ट हैं ये अनुसंधान का विषय अलग से है। फिलहाल सिल्क सिटी में बडे नेताओं को भी उसी का वरदहस्त और आर्शीवाद मिलता है जिसकी तिजोरी में दम होता है।

नगरनिगम के चुनाव में गरीब, वंचित और पिछडे समुदाय के कई उम्मीदवारों ने शानदार जीत हासिल की लेकिन मेयर और उपमेयर की के ताज की जब बात होती है तो यह तबका हाशिया पर चला जाता है। इन जीते गये जनप्रतिनिधियों का कोई गाँडफादर भी नहीं बनना चाहता। 51 प्रत्याशियों में 26 महिलाओं ने जीत का ताज पहना है। लेकिन बात जब प्रतिनिधित्व की होती है तो डा प्रीति शेखर बिना ताज के भी बाजी मार ले जाती हैं। उनके शब्दों के चयन में सर्तकता होती है, वे मीडिया के नेशनल डिबेट में भी खुलकर बोलती हैं। लेकिन असल खेल कुछ और है यह शह-मात का खेल है।

भीतरखाने में मेयर और उपमेयर के ताज को लेकर सिद्यांतों और मूल्यों की सिल्क सिटी में अर्थी सज गयी है। अर्थी पर एक बार फिर नोटों की माला है, और गाजे-बाजे के साथ बैंड वाले भी तैयार बैठे हैं। मूल्यविहीन राजनैतिक सिद्यांत शोरुम से बाहर निकल कर बोलियां लगा रहा है, जीते-गये उम्मीदवारों की जमीर कितने में बिकेगी यह तय करने के लिए तराजू भी तैयार है पूरे आईएसआई मार्का वाले बटखरे के साथ।

यकीन मानिये ये कानाफसी भी तेज है । शहर में कौन मेयर व उपमेयर इसका चीरहरण हो चुका है। लिबास हट चुका है, नकाब टूट चुके हैं। फैसला हो चुका हैं । कुछ विजयी प्रत्याशी शहर के बाहर पिकनिक मनाने में लगे हुए हैं वे चिकन बिरयानी और मलाई कोफ्ता का स्वाद चटखारे ले रहे हैं। मेयर पद के दावेदार फिलहाल नासरीन बेगम ,सीमा साह,फरीदा आफरीन और बबीता देवी आदि के नाम चर्चे में है। जो गोल-गोल है।  यह पद पिछड़ी कोटि की महिला के लिए आरक्षित है। नासरीन जदयू की राज्यसभा सदस्य कहकंशा परवीन की गोतनी हैं जबकि सीमा साह जिला परिषद अध्यक्ष टुनटुन साह की पत्नी है। फरीदा आफरीन सिल्क के कारोबारी और पूर्व पार्षद इबरार हुसैन की बहन हैं। बबीता स्वास्थ्य विभाग के एक कर्मचारी की पत्नी हैं। सीमा पर भाजपा, फरीदा व नासरीन पर जदयू खेलगा दांव जिप अध्यक्ष टुनटुन साह भाजपा से जुड़े हैं। वे तथा कथित तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री सुशील मोदी के करीब हैं। वे अपनी पत्नी सीमा साह को मेयर बनाने के लिए गोड्डा के भाजपा सांसद निशिकांत दूबे के भी संपर्क में हैं।

वहीं दूसरी ओर जदयू नासरीन बेगम या फरीदा आफरीन पर दांव खेलने की तैयारी में हैं। बड़े राजनेताओं के संवाद का स्तर इन दिनों बेहद ज्ञानी और विवेकी हो गया है। वे अपने नफे नुकसान को देखकर यह बोलना नहीं भूलते- देखिये मेयर और उपमेयर कोई भी बनें, शहर का विकास होना चाहिये।

खैर, असली खेल तो सबको पता है इस चेतना विहीन शहर में मंजूषा कला को देश-दुनिया में शीर्ष पर पहुचाने वाले मनोज पंडित चुनाव हार गये। यही इस शहर का मिजाज है। प्रतिनिधित्व सोने की पालकी से उतरती है और कीचड से सने पांव से लोगों की फर्श मैली हो जाती है।

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