दीपावली आत्मा के प्रकाश का पर्व

दीपावली आत्मा के प्रकाश का पर्व

दीपावली आत्मा के प्रकाश का पर्वक्या यह उचित नहीं होगा कि हम #श्रीराम की #अयोध्या वापसी का यह पर्व शिष्टता व शालीनता के साथ दीये, रोशनी जलाकर तथा पौष्टिक भोजन, फल व मिठाई खाकर मनाएं। जुए-शराब व पटाखे जलाकर इसे समाज के लिए हानिकारक क्यों बनाएं? धन बचाकर उसे परिवार के कल्याण तथा परोपकार में लगाएं। इस तरह से सही मायने में मर्यादा #पुरुषोत्तम_श्रीराम के आदर्शो के अनुरूप #दीपावली पर्व मनाएं।

अपनी प्यारी धरती को सुंदर एवं सुरक्षित बनाने के लिए आज हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि ‘प्रदूषण द्वारा मानव जगत का विनाश हो रहा है, उससे मानव जगत को मुक्त करेंगे’, ‘हम दिवाली जरूर मनाएंगे, पर पटाखे नहीं जलाएंगे।’

शुभ दीपावली के बारे में जन समुदाय को साफ-सुथरा पर्यावरण निर्मित करने के प्रति जागरूक करते हुए यह बताया जाना चाहिए कि वे पटाखे न छुड़ाएं। यह पर्यावरण, आर्थिक, स्वास्थ्य, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत हानिकारक है।

भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक ‘दीपावली’ प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। विश्व के अलग-अलग देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय भी इस पर्व को प्रकाश पर्व के रूप में धूमधाम से मनाते हैं।

दीपावली मनाते समय हमारा हृदय निर्मल, मन प्रसन्न, चित्त शांत, शरीर स्वस्थ एवं अहंकार ‘शून्य’ हो, ऐसी ही अनुनय विनय है। भाई-बहन के पवित्र प्रेम तथा आत्मीयता में वृद्धि हो। त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम जब पिता की वचन-पूर्ति के लिए चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके तथा अहंकारी रावण का वध करके अपनी पत्नी सीता एवं अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने उनके स्वागत के लिए, अपनी खुशी प्रदर्शित करने के लिए तथा अमावस्या की रात्रि को उजाले से भरने के लिए हजारों दीपक जलाए थे।

दीपावली को आलोक पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह प्रकाश पर्व श्रीराम की शिक्षाओं को जानने तथा उन शिक्षाओं पर चलकर आत्मा का जीवन जीने की प्रेरणा देता है। दीपावली मात्र एक पर्व अथवा त्योहार नहीं है, अपितु यह हमें अपने अंदर आत्मा का प्रकाश धारण करने की प्रेरणा देता है।

जैन धर्म के अनुयायिओं का मत है कि दीपावली के ही दिन महावीर स्वामी जी को निर्वाण मिला था। सिख धर्म को मनाने वाले कहते हैं कि इसी दिन उनके छठे गुरु श्री हर गोविंद सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

वनवास के मध्य ही लंका का राजा रावण श्रीराम की पत्नी सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया था और तब हनुमान, अंगद, सुग्रीव, जामवंत एवं विशाल वानर सेना के सहयोग से समुद्र पर सेतु-निर्माण कर तथा सोने की लंका पर आक्रमण करके उन्होंने रावण जैसे आतताई का वध कर धर्म तथा मर्यादित समाज की स्थापना धरती पर की थी।

इसके अलावा संपूर्ण मानव जाति को यह संदेश दिया कि ‘आतंक चाहे कितना भी सिर उठाने की कोशिश करे तो भी उसका अंत निश्चित है’ और ‘बुराई पर अच्छाई सदा भारी हुआ करती है।’ इस स्मृति में हर वर्ष दशहरा मनाया जाता है जो ‘विजय दशम’ के नाम से भी विख्यात है और दशहरे के लगभग बीस दिन बाद ही दीपावली आती है।

श्रीराम ने राम राज्य की स्थापना जादू की छड़ी घुमाकर नहीं कर दी। राम ने अपने पूरे जीवन भर अनेक कष्ट उठाकर मर्यादाओं का पालन करते हुए राम राज्य की स्थापना की। राम राज्य के मायने अयोध्या के राजा राम का राज्य नहीं, वरन सारे संसार में आध्यात्मिक साम्राज्य स्थापित करना है। ऐसे राज्य में नगर, घर, खेत, खलियान गांव, बाग, नदी, गुफा, घाटी, गली सभी जगहें ईश्वरीय आलोक से भर जाते हैं। एक ऐसा राम राज्य, जहां किसी को भी शारीरिक, दैविक तथा भौतिक किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होगा।

हमारा मानना है कि परिवार की एकता समाज की आधारशिला है। इसलिए हमें भी श्रीराम के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने परिवार के सदस्यों के बीच एकता स्थापित करने का हर कीमत पर प्रयत्न करना चाहिए।

यह त्योहार सारे भारत में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ कार्तिक मास की अमावस्या पर तीन दिनों तक मनाया जाता है। अमावस्या से दो दिन पहले का दिन ‘धनतेरस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसका संदेश है आरोग्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

दरअसल, इस दिन भगवान धंवन्तरि का प्राकट्य हुआ था जो सबको आरोग्य देते हैं, लेकिन कालांतर में यह दिन कोई न कोई नया बर्तन, सोना ,चांदी आदि खरीदने के अवसर के रूप में विख्यात हो गया।

इस दिन तुलसी के पेड़ के पास या घर के द्वार पर दीपक जलाया जाता है। अगला दिन चतुर्दशी- ‘नरक-चतुर्दशी’ या छोटी दीपावली के नाम से प्रसिद्ध है। कहते हैं कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाआतंकी नरकासुर नाम के दैत्य का वध किया था। दीपावली के लगभग एक माह पूर्व से घरों में स्वच्छता, पुताई, रंग-रोगन एवं साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

दीपावली के दिन लक्ष्मी जी एवं गणेश जी का पूजन अत्यंत श्रद्धा एवं आस्था के साथ किया जाता है। तरह-तरह के व्यंजन एवं खील-बताशों से उन्हें भोग लगाया जाता है। पकवान तो इतने बनाए जाते हैं कि जैसे मां अन्नपूर्णा ने अपने भंडार ही खोल दिए हों। रंग-बिरंगी ‘रंगोली’ हर द्वार की शोभा में चार चांद लगाती हैं। सब लोग नए वस्त्र पहनते हैं। अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों को शुभ-कामनाएं एवं उपहार देते हैं, मिठाई खिलाते हैं।

दीपावली-पूजन के साथ ही व्यापारी नए बही-खाते प्रारंभ करते हैं और अपनी दुकानों, फैक्ट्री, दफ्तर आदि में भी लक्ष्मी-पूजन का आयोजन करते हैं। कई इसी दिन नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत करते हैं। एक बात अत्यंत महžवपूर्ण है कि दीपावली पर एक दीये से ही दूसरा दीया जलाया जाता है और यह संदेश स्वत: ही प्रसारित हो जाता है कि ‘ज्योत से ज्योति जलाते चलो, प्रेम की गंगा बहाते चलो।’ तथा ‘अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा है एक दीप जलाएं।’

तीनों ही दिन रात्रि में दीप जलाए जाते हैं। दीपावली के दूसरे दिन ‘गोवर्धन पूजा’ मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने लोकहित के लिए इंद्र के अहंकार को तोड़कर उसे पराजित किया था। इस दिन गाय की पूजा पूरे भक्ति भाव से होती है।

दीपावली के दो दिन बाद तक यानी भाईदूज तक दीपावली की रोशनी से पूजा स्थल, हर घर, गली, चौराहे जगमगाते रहते हैं। भाईदूज के शुभ अवसर पर बहन अपने भाई के मस्तक पर तिलक लगाकर उसकी भलाई की प्रार्थना तथा उसके शुभ संकल्पों में पूरा सहयोग करने का वचन देती है।

जब बहन, भाई की ललाट पर टीका लगाती है तो वह कह रही होती है, “मेरे प्रिय भाई मैं जीवन के प्रत्येक क्षण में आपके जनहित के संकल्प को पूरा करने में सहयोग करूंगी।”

हम दीपावली का परम-पावन त्योहार खूब उत्साह से मनाकर अपनी संस्कृति को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन ऐसे सुंदर अवसरों पर यह चर्चा करना अक्सर भूल जाया करते हैं कि कैसे भगवान श्रीराम ने प्रभु की आज्ञा तथा इच्छा को जानने के बाद समाज में मर्यादा का आदर्श प्रस्तुत करने के लिए अपने जीवन के राजसी सुखों को दांव पर लगा दिया।

श्रीराम की शिक्षाएं हमें थोड़ी देर के लिए भक्ति में भावविभोर कर देने के लिए नहीं हैं, वरन वह जीवनशैली व जीवन जीने का समग्र ज्ञान कराती है। साथ ही यह मनुष्य के जीवन में वैचारिक बदलाव लाकर रामराज्य की स्थापना का एक सुनिश्चित एवं ठोस आधार है।

श्रीराम द्वारा अपने जीवन द्वारा दी गई मर्यादा की शिक्षाएं युगों-युगों तक मानव जाति को मर्यादित जीवन जीने का मार्गदर्शन करती रहेगी। श्रीराम ने अपने जीवन से मयार्दाओं के पालन की शिक्षा देकर मानव जीवन को मर्यादित बनाया।

श्रीराम ने कोई ग्रंथ नहीं दिया। महापुरुषों ने श्रीराम के जीवन चरित को अपनी कल्पनाशक्ति के आधार पर व्यक्त किया है। रामायण के प्रणेता थे आदिकवि वाल्मीकि। उनकी काव्य-कृति ‘रामायण’ उनके अंतरंग से प्रस्फुटित हुई। महान संत तुलसीदास द्वारा अवधी में रचित ‘रामचरित मानस’ जन सामान्य में लोकप्रिय धार्मिक ग्रंथ है।

शुभ दीपावली के बारे में जन समुदाय को साफ-सुथरा पर्यावरण निर्मित करने के प्रति जागरूक करते हुए यह बताया जाना चाहिए कि वे पटाखे न छुड़ाएं। यह पर्यावरण, आर्थिक, स्वास्थ्य, मानसिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक ²ष्टि से बहुत हानिकारक है।

बाल एवं युवा पीढ़ी को बताया जाना चाहिए कि बहुत तेज आवाज वाले (125 डेसिबल से अधिक) पटाखे जलाने पर कानूनी प्रतिबंध है। शांति क्षेत्र यानी अस्पतालों आदि के 100 मीटर के दायरे में पटाखे छोड़ना पूर्णत: प्रतिबंधित है।

हमारे देश में दीपावली पर 3,000 करोड़ रुपये से अधिक के पटाखे एक दिन में धुआं-बारूद बनकर हमारे वायुमंडल व वातावरण को विषाक्त करते हैं। इस धन से कितने अंधेरे घरों में चिराग जल सकते हैं तथा कितने बच्चों को मुरझाए चेहरे खिल सकते हैं।

हर वर्ष दीपावली पर हो रही आग की हजारों दुर्घटनाओं के कारण कितने बच्चे-नवयुवक अंधे-बहरे व अपंग हो रहे हैं और कितनों की मृत्यु हो रही है तथा अकल्पनीय राष्ट्रीय संपदा तथा मानव संसाधन जलकर खाक हो रहे हैं।

पटाखों के हुड़दंग से हमारे साथ पृथ्वी पर रहने वाले मासूम पशु-पक्षी बेहाल व मरणासन्न हो जाते हैं। हमारे शास्त्रों, पुराणों, चारों वेदों, रामायण, गीता में पटाखे-आतिशबाजी चलाकर दीपावली मनाने का कोई उल्लेख नहीं है। जुए-शराब व पटाखों के बारूद से मनाई जाने वाली दीपावली का पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की शिक्षाओं पर चलने की घोर उपेक्षा करना है।

आप समझ सकते हैं कि पूरे भारतवर्ष में अस्थमा रोगियों को पटाखों का प्रदूषण किस प्रकार हानि पहुंचाता होगा। क्या हम इस पाप के भागीदार नहीं हैं?

दीपावली के दिन शाम 6 से लेकर रात 10 के बाद पटाखे चलाने एवं आतिशबाजी करने पर पूर्ण प्रतिबंध है। रात 10 बजे के बाद पटाखे छोड़ने पर आपके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

केवल देश के एक महानगर में जले पटाखों का 1500 मीट्रिक टन कचरा जो फास्फोरस, सल्फर व पोटेशियम क्लोरेट से युक्त है, हमारी मिट्टी, पानी तथा हवा में जहर भर देगा। इस जानलेवा प्रदूषण से देश के शहर गैस चैम्बर बन जाएंगे।

इस दीपावली पर अनुमानत: लगभग 50,000 दिल्ली में निवास करने वाले अस्थमा मरीज डाक्टरी सलाह पर कुछ दिनों के लिए दिल्ली छोड़कर चले जाएंगे।

दीपावली के पटाखों के कारण वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कई गुणा बढ़ जाती है जो सबके स्वास्थ्य के लिए विष तुल्य है। बच्चे, बूढ़े और बीमार इससे विशेष प्रभावित होते हैं।

दीपावली का पर्व सुख-समृद्धि, सुयश-सफलता, उन्नति, पवित्रता और घर-आंगन की स्वच्छता की प्रेरणाओं से ओतप्रोत पर्व है, ताकि अज्ञानता के अंधकार की सारी बेड़ियां कट जाएं और संसार का प्रत्येक व्यक्ति ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हृदय धारण करके विश्व में सामाजिक परिवर्तन लाने का सशक्त माध्यम बने।

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