कैसा विकास हो रहा है बिहार में ?

कैसा विकास हो रहा है बिहार में ?

farmersजिसमें गैर-बराबरी की खाई दिनों-दिन चौड़ी होती जा रही है। एक खास तरह की सामाजिक और आर्थिक असमानता #बिहार में बढ़ती हुई देखी जा सकती है।

बिहार में सीमांत किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी बड़े किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी से बीस गुना कम है। बिहार के ग्रामीण इलाकों में लोगों की आमदनी साल-दर-साल कम हो रही है। बिहार में खेती आज घाटे का सौदा है।ग्रामीण इलाके का कोई सीमांत कृषक परिवार खेती में जितने घंटे की मेहनत करता है, अगर हम उन घंटों का हिसाब रखकर उससे होने वाली आमदनी की तुलना करेंगे तो निष्कर्ष निकल कर आएगा कि कृषक परिवार को किसी भी लिहाज से न्यूनतम मजदूरी भी हासिल नहीं हो रही है। जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है, वे अपने परिवार की बुनियादी जरुरतों को भी पूरा कर पाने में असमर्थ हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है, जबकि खेती सहित अन्य सारे स्रोतों से उसे औसतन मासिक 2115 रुपये हासिल होते हैं, जिसमें दिहाड़ी मजदूरी भी शामिल है यानी किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से लगभग 25 फीसदी ज्यादा है।

बिहार में विकास तब तक सतही और खोखला माना जाएगा, जब तक यहां के किसान सुखी और समृद्ध नहीं होंगे। विकास के इस बहुप्रचारित दौर में ‘कृषि रोड-मैप ‘ जैसी याजनाओं के तहत किसानों के पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली को दरकिनार करते हुए पश्चिमी तौर-तरीके थोप दिए गए। परिणाम यह हुआ कि बढ़ने की बजाय इन योजनाओं से जुड़ीं अनेकों जटिल समस्याएं भी उत्पन्न हो गर्इं। बिहार में अब तो संकट किसानों के अस्तित्व का है । कृषि के क्षेत्र में एवं कृषि आधारित उद्यम में सरकारी व गैरसरकारी निवेश नगण्य है और अगर निवेश घटेगा तो स्वाभाविक तौर पर उस क्षेत्र का विकास बाधित हो जाएगा। अभी प्रदेश के किसानों की जो दुर्दशा है, वह इन्हीं अदूरदर्शी नीतियों की वजह से है। इस बदहाली के लिए प्रदेश का अदूरदर्शी नेतृत्व ही सीधे तौर से जिम्मेदार है। बीते सालों के अनुभव से साफ है कि किसानों की हालत को सुधारे बगैर बिहार का विकास सम्भव नहीं है।

विकास के प्रारूप व परियोजनाओं एवं जमीनी हकीकत (यथार्थ) के बीच सार्थक सामंजस्य के बिना विकास का कोई भी प्रारूप सही मायनों में फ़लीभूत नहीं होगा। जब तक सबसे निचले पायदान पर जीवन-संघर्ष कर रहे हैं, प्रदेश के वासी को ध्यान में रखकर विकास की प्राथमिकताएं तय नहीं की जाएंगी तब तक विकास दिशाविहीन और दशाविहीन ही होगा।

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