17 साल बाद भी रांची वासियों को जाम से निजात नहीं, साल में 180 घंटे जाम में बीत जाती

17 साल बाद भी रांची वासियों को जाम से निजात नहीं, साल में 180 घंटे जाम में बीत जाती

झारखंड अलग राज्य बनने के 17 साल बाद भी राजधानी रांची के लोगों को जाम से निजात नहीं मिल पायी है| हालांकि, अब तक जितनी भी सरकारें बनी हैं, उन्होंने राजधानी की यातायात व्यवस्था को सुधारने के लिए कई योजनाएं बनायीं| फ्लाई ओवर, चौड़ी सड़कें, मेट्रो ट्रेन और मोनो रेल चलाने तक की योजना बनी, लेकिन एकाध योजना ही धरातल पर दिखी|

रांची की आबादी 16  लाख से ज्यादा है| इसके अलावा आसपास के इलाकों से  रोजाना बड़ी संख्या में लोग राजधानी में अपने जरूरी काम के लिए आते हैं| ऐसे में शहर की सड़कों पर राेजाना वाहनों का भारी दबाव होना लाजमी है, जो जाम की वजह बनते हैं| जाम की वजह से सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल से लौट रहे बच्चों और एंबुलेंस से अस्पताल जा रहे मरीजों को होती है| कई बार तो जाम के चक्कर में मरीजों की जान पर बन आती है|

संकरी सड़कों पर वाहनों का दबाव, धरना-प्रदर्शन से भी लगात है जाम :

शहर की प्रमुख सड़कों पर जाम लगाने की पहली वजह तो बड़ी संख्या में वाहनों का परिचालन ही है| सड़कों के किनारे अतिक्रमण और वाहनों की बेतरतीब पार्किंग भी जाम की वजह बनते हैं| इसके अलावा समय-समय पर होनेवाले धरना-प्रदर्शन और जुलूस के कारण भी शहर की सड़कें जाम हो जाती हैं| कई जगहों जब हल्का-फुल्का जाम लगने पर लोग जल्दी आगे निकलने के चक्कर में अपने वाहन आड़े-तिरछे कर देते हैं, जिससे जाम और भी लंबा हो जाता है| यानी राजधानीवासियों में यातायात नियमों के प्रति जागरूकता नहीं है, जिसकी वजह से बाद में उन्हें ही परेशानी झेलनी पड़ती है|

ऑटो, ई-रिक्शा और सिटी बसों की मनमानी से भी जाम होती हैं सड़कें:

राजधानी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में चलनेवाले ई-रिक्शा, ऑटो और सिटी बसें भी जाम की वजह बनते हैं| राजधानी में 700 ई-रिक्शा, 15000 ऑटो और 45 सिटी बसें भी चलती हैं| इन वाहनों के चालक राह चलते कहीं भी अपने वाहन रोक कर यात्रियों को चढ़ाते और उतारते हैं, जिसकी वजह से अक्सर सड़क जाम हो जाती है| कांटाटोली चौक पर हमेशा एक सिटी बस लगी रहती है, जिससे वहां जाम ज्यादा  लगता है|

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