मेड इन इंडिया के मायने एन के सिंह, पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय सचिव

मेड इन इंडिया के मायने एन के सिंह, पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय सचिव

स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देश को संबोधित किया, तो कई चीजें पहली बार हुईं। लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण चीज थी कि इस संबोधन में पहली बार संयम बरता गया और ढेर सारी योजनाओं की घोषणा नहीं हुई। ऐसी घोषणाएं जिन पर बाद में कोई काम नहीं होता। स्वास्थ्य, स्वच्छता और शौचालय की आवश्यकता के संदेश के साथ ही इस संबोधन में आर्थिक महत्व की कुछ घोषणाएं जरूर हुईं, जो काफी अहम हैं। जैसे समाजवादी युग के अवशेष योजना आयोग का पुनर्गठन, जनधन योजना के तहत हर परिवार के कम से कम दो बैंक अकाउंट और भारत को मैन्युफैक्चरिंग देश बनाने का संकल्प। युवा वर्ग को रोजगार देने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सबसे जरूरी कदम है। सिर्फ सेवा क्षेत्र के भरोसे ही देश बेरोजगारी की समस्या से मुक्ति नहीं पा सकता। उनकी इस मैन्युफैक्चरिंग रणनीति का मूलमंत्र है- ‘मेड इन इंडिया’। आखिर इस ‘मेड इन इंडिया’ का क्या अर्थ है?

हमारे बचपन में ‘मेड इन जर्मनी’ का ठप्पा किसी चीज की गुणवत्ता और उसके टिकाऊपन की गारंटी होता था। इसके मुकाबले में था ‘मेड इन जापान’, जिसका मतलब था सस्ता, खराब गुणवत्ता का सामान, जो वाजिब कीमत पर मिल जाता था। बाद में जब जापान ने अपने लघु और मध्यम उद्योगों को एकीकृत करके बड़े उत्पादन केंद्र बनाए, तो इसकी छवि में काफी सुधार हुआ। यह कई दशक तक चला और बाद में कोरिया ने जापान की शैली से ही उसे टक्कर देनी शुरू कर दी। सोनी, नेशनल, पैनासोनिक, तोशिबा और हिताची जैसे ब्रांड की जगह जल्द ही एलजी और सैमसंग ने ले ली। इसके बाद जब चीन ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं में सुधार किया, तो वह खिलौनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक बाजार तक सबमें छाने लगा। ‘मेड इन जर्मनी’ से लेकर ‘मेड इन चाइना’ तक का यह सफर मैन्युफक्र्चिंरग प्रक्रिया के बदलाव को भी दर्शाता है। इसलिए अगर हम ‘मेड इन इंडिया’ की बात करते हैं, तो हमें अपनी क्षमताओं, तकनीक, उत्पादकता, उत्पादन प्रक्रिया और यहां तक कि नियम-कायदों में भी काफी बदलाव लाना होगा। भारत को नई साख और नई हैसियत देने का इससे बेहतर कोई और नारा नहीं हो सकता। प्रधानमंत्री हमेशा ही यह कहते रहे हैं कि मैन्युफैक्चरिंग ऐसा क्षेत्र है, जिसमें देश को कोई समझौता नहीं करना चाहिए। साथ ही, उन्होंने पर्यावरण का ध्यान रखने की भी बात कही है। ‘मेड इन इंडिया’ एक ऐसा मूलमंत्र है, जो देश को कई तरह से गति दे सकता है। लेकिन हमें इसे लेकर यथार्थवादी नजरिया अपनाना होगा और समस्याओं पर विचार करना होगा, जो मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की बाधा बनती हैं।
सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि देश का मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र बहुत छोटा है। भारत की जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 15 फीसदी ही है, जबकि चीन और थाईलैंड जैसी अर्थव्यवस्थाओं में यह हिस्सेदारी 25-30 फीसदी तक है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में देश के महज 12 फीसदी श्रमिकों को ही रोजगार मिला है। 1990 के दशक की शुरुआत में आर्थिक सुधारों के बाद इस क्षेत्र में कुछ तेजी दिखी थी, लेकिन बाद में यह ठंडा पड़ने लगा। 2003-08 में फिर तेजी आई, लेकिन 2013 तक इसकी वृद्धि दर तेजी से गिरते हुए शून्य से नीचे चली गई। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में इस समय जो मंदी है, उसे देखते हुए देश के श्रम कानूनों, नियामक संस्थाओं, पर्यावरण नीतियों, विदेशी निवेश के नियमों, कर-नीतियों और भूमि अधिग्रहण कानूनों आदि में बदलाव की जरूरत है। भारत इस क्षेत्र में पिछड़ गया है, लेकिन इनोवेशन और कम लागत के बल पर आगे बढ़ सकता है।
दूसरा, कोई भी देश तब तक विकसित नहीं हो पाता, जब तक कि वह कृषि क्षेत्र से श्रमिकों की संख्या कम करके उन्हें अधिक उत्पादकता वाले मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की ओर नहीं ले जाता। अध्ययन बताते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में पैदा होने वाला रोजगार का अवसर सेवा क्षेत्र में दो से तीन रोजगार के अवसर पैदा करता है। यानी इस क्षेत्र पर जोर देकर हम बड़ी तादाद में रोजगार पैदा कर सकते हैं और कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त श्रम को इसमें लगा सकते हैं। पूर्वी एशिया के देशों का अनुभव बताता है कि कम कुशलता वाले फैक्टरी रोजगार को लगातार बढ़ाना ही समाधान है। इस क्षेत्र के लगातार विस्तार के लिए हमें शिक्षा, प्रशिक्षण और कुशलता में विकास की व्यवस्था को खड़ा करना होगा।

तीसरा, देश के मौजदा श्रम कानून मुट्ठी भर श्रमिकों को रोजगार की सुरक्षा तो देते हैं, लेकिन वे श्रमिकों की एक बहुत बड़ी फौज से उसके रोजगार के अवसर छीन लेते हैं। खास तौर पर उन श्रमिकों से, जो अनौपचारिक क्षेत्र में हैं और जिनकी आमदनी बहुत कम है। श्रम बहुल देश होने का जो फायदा इस देश को मिल सकता है, वह इन्हीं कानूनों की वजह से नहीं मिल पाता और भारत अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में बहुत पीछे रह जाता है। श्रम कानून और लघु उद्योग के लिए आरक्षण ऐसे कानून हैं, जिनके न होने की वजह से ही पूर्वी एशिया के देशों के श्रमिक अब मध्यवर्ग में शामिल हो चुके हैं। आज हालत यह है कि चीन को वियतनाम, कंबोडिया और बांग्लादेश जैसे देशों से टक्कर मिल रही है, लेकिन भारत से नहीं। अच्छी बात यह है कि नई सरकार ने श्रम सुधार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे को उठाया है। इससे निर्यात और रोजगार बढ़ाने में मदद मिलेगी।

चौथा, इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में सुधार से भी मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की उत्पादकता और स्पर्धा करने की क्षमता बढ़ सकती है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र अच्छी तरह चल सके और अच्छी स्पर्धा दे सके, इसके लिए हमें ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए, जिससे लागत कम हो सके और गुणवत्ता व उत्पादकता बढ़ाई जा सके। भारत में सड़कों के अलावा, विद्युत और जल आपूर्ति का पर्याप्त न होना भारतीय उद्योगों को स्पर्धा में टिकने नहीं देता। भारत के बंदरगाहों पर मंजूरी पाने के लिए तीन दिन से एक महीने तक का समय लग जाता है। ये ऐसी व्यवस्थाएं हैं, जिनसे लागत बढ़ती है और आपूर्ति बाधित होती है। इसकी वजह से नए उद्यमी ऐसे क्षेत्र में जाने से बचते हैं।
अंत में, मैन्युफैक्चरिंग के विकास के लिए कारोबार करने की आसानी एक केंद्रीय तत्व है। केंद्र, राज्य व स्थानीय स्तर की बहुस्तरीय नियामक व्यवस्थाएं और जटिल प्रक्रियाएं निवेशकों के लिए मुश्किलें खड़ी करती हैं, जिनके चलते निवेशक पूंजी प्रधान उद्योगों में हाथ डालने से बचते हैं। भारत में मैन्युफैक्चरिंग इकाई चलाने वाले को हर साल 70 तरह की नियमावलियों का पालन करना होता है और 100 तरह के रिटर्न भरने होते हैं। हाल-फिलहाल इसे कम करने की जो कोशिशें हुई हैं, उन्हें बहुत ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। विश्व बैंक के एक ताजा सर्वे के अनुसार, भारत में मैन्युफैक्चरिंग इकाई शुरू करना या बंद करना बाकी दुनिया के मुकाबले सबसे कठिन है। तीन साल पहले बनी राष्ट्रीय मैन्युफैक्चरिंग नीति भी इसे नहीं बदल सकी।

पिछले कुछ सप्ताह में श्रम कानूनों में सुधार और पर्यावरण की मंजूरी में तेजी के लिए मोदी ने कुछ साहसपूर्ण कदम उठाए हैं। रेलवे और रक्षा क्षेत्र को भी विदेशी निवेश के लिए खोला है। इस सबको देखते हुए मेड इन इंडिया का उनका मूलमंत्र और भी ज्यादा विश्वसनीय लगता है।

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courtesy- HT MEDIA

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