महाराष्ट्र में जीत के बाद भाजपा की नज़र अब झारखंड और जम्मू-कश्मीर पर

महाराष्ट्र में जीत के बाद भाजपा की नज़र अब झारखंड  और जम्मू-कश्मीर पर

                                                         bjp

महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी और हरियाणा में पूरा बहुमत हासिल करने के बाद भारतीय जनता पार्टी पूरे उत्साह में है। जाहिर है कि उसकी निगाह अब झारखंड और जम्मू-कश्मीर पर है। जहां चुनाव आयोग ने बिगुल बजा दिया है। दोनों ही राज्यों में राजनीतिक हालात अलग-अलग हैं। लेकिन एक बात दोनों में समान है और वह है कि दोनों ही जगहों पर विकास अहम मुद्दा है।

 

दोनों ही राज्य प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हैं। पहले में जहां पर्यटन की संभावनाएं अब तक नहीं खोजी गईं तो दूसरे में नब्बे में आतंकवाद के उभार के पहले तक सैलानियों के सहारे स्थानीय अर्थव्यवस्था चलती थी। लेकिन तब से लेकर दो दशक बीत चुके हैं और कभी-कभी हालात भले ही सामान्य हो जाएं, लेकिन एक बात साफ है कि दोनों ही राज्य विकास की गति में बहुत पीछे हैं। इसलिए दोनों ही राज्यों में एक मुद्दा विकास तो है ही। हालांकि पिछड़ेपन के लिए एक जगह घरेलू राजनीतिक हालात जिम्मेदार हैं तो दूसरी जगह अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के साथ ही सीमा पार से लगातार निर्यात हो रहा आतंकवाद ज्यादा जिम्मेदार है। 

 

झारखंड की स्थापना 2000 में उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के साथ ही हुई थी। लेकिन दुर्भाग्य ऐसा रहा कि दोनों ही राज्यों की तरह झारखंड में कभी स्थायी सरकार नहीं रही। एक बार तो ऐसा भी रहा कि अकेली जीत हासिल करने वाले मधु कौड़ा राज्य के मुख्यमंत्री बन गए और उसके बाद राज्य के साथ जो कुछ भी हुआ, उसका असर अब तक नजर आ रहा है। मधु कौड़ा जेल में हैं और उनके कई साथी भी जेल की हवा खा रहे हैं। लेकिन यह मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि इस हालत के भारतीय जनता पार्टी की शुरुआती गलतियां भी जिम्मेदार रहीं। जब बिहार से अलग होकर 14 साल पहले झारखंड में सरकार बनी तब 81 सदस्यीय विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल था।

 

इसके दम पर तब के केंद्रीय वन और पर्यावरण राज्य मंत्री बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बनाया गया। मरांडी विश्व हिंदू परिषद के जरिए राजनीति में आए थे। लेकिन आदिवासी और गैर आदिवासी के मुद्दे पर उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने हटाकर झारखंड मुक्ति मोर्चा से भारतीय जनता पार्टी में आए अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बना दिया। अपने हटाए जाने की फांस बाबूलाल मरांडी आज तक नहीं भूल पाए। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद उन्हें पार्टी में वापसी का प्रस्ताव दिया गया। लेकिन वे नहीं लौटे और कांग्रेस के साथ गठबंधन करके पिछला चुनाव लड़ा और छह विधायक विधानसभा पहुंचाने में कामयाब रहे। अमित शाह की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें वापस बुलाने और मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करने की कोशिश की। लेकिन मरांडी नहीं लौटे तो भारतीय जनता पार्टी ने उनके पांच विधायकों को ही पार्टी में शामिल कर लिया।

 

बहरहाल पिछले लोकसभा चुनावों में राज्य की 14 में से 12 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की है। यानी हवा बीजेपी के पक्ष में ही मानी जा रही है। ऐसे में माना तो यही जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र की लोकप्रियता का फायदा उठाते हुए पार्टी यहां भी बहुमत हासिल करने की कोशिश करेगी। वैसे अखिल झारखंड स्टूडेंट यूनियन भारतीय जनता पार्टी का निष्ठावान सहयोगी रहा है। लिहाजा उसके साथ गठबंधन की गुंजाइश बनी हुई है।

 

दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा, जनता दल यू, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस मिलकर महागठबंधन बनाकर भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने की कोशिश में है। इस महागठबंधन के जरिए झारखंड मुक्ति मोर्चा सिंहभूम और संथाल परगना की करीब चालीस सीटों पर ही अपना ध्यान केंद्रिंत करने की कोशिश में है तो बाकी चालीस-इकतालीस सीटों पर बाकी दल सामने होंगे। बहरहाल यह राज्य अपने साथ अस्तित्व में आए दो राज्यों की तुलना में अब तक पिछड़ा ही है। जिसकी बड़ी वजह राजनीतिक स्थायीत्व की कमी ही रहा है और भारतीय जनता पार्टी इसे मुद्दा बनाकर मोदी की लोकप्रियता के कोलाज के साथ भुनाने की कोशिश में है। वैसे भी इस राज्य में देश का तकरीबन 30 फीसदी खनिज, यूरेनियम और प्राकृतिक संपदा मौजूद है। ऐसे में पिछड़ेपन को लेकर मुद्दा बनाना आसान भी है। 

 

चुनाव जम्मू-कश्मीर की 87 सीटों के लिए भी हो रहे हैं। दिलचस्प यह है कि यहां की ज्यादातार आबादी जम्मू इलाके में रहती है। लेकिन राष्ट्रपति के 1956 के आदेश के तहत यहां चुनाव आयोग के परिसीमन के नियम लागू नहीं हो सकते। लिहाजा अब भी इस इलाके में 36 विधानसभा सीटें ही हैं। जबकि इसकी तुलना में कश्मीर घाटी की आबादी कम है। लेकिन यहां 47 सीटें हैं। जबकि लद्दाख क्षेत्र में सिर्फ चार विधानसभा सीटें हैं।

 

यह भी देखने की बात है कि जम्मू इलाके की अधिसंख्य आबादी हिंदू है तो लद्दाख में बौद्ध मतावलंबियों का बोलबाला है। जबकि कश्मीर घाटी में मुसलमान आबादी नब्बे फीसदी है। इसके साथ ही अलगाववाद भी इसी इलाके में ज्यादा है। इसलिए अगर यहां भारतीय जनता पार्टी अपना झंडा फहराना भी चाहती है तो इसके लिए जरूरी है कि वह जम्मू और लद्दाख इलाके की सारी सीटें जीते और घाटी की भी कुछ सीटों में सेंध लगाए। जो आसान नहीं लगता। 

 

हालांकि वितस्ता में आई बाढ़ और उसके बाद जिस तरह प्रधानमंत्री ने 2100 करोड़ की राहत का ऐलान किया और दीपावली श्रीनगर में मनाई, उसका संकेत साफ है कि वह घाटी के वोटरों के बीच भाजपा की पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा भाजपा की कोशिश कश्मीर घाटी के मुसलमानों का दिल जीतकर यह संदेश देने की भी है कि वह मुस्लिम समुदाय में स्वीकार्य है।

 

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