भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है ओबामा व जिनपिंग के बीच होने वाली बैठक

भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है ओबामा व जिनपिंग के बीच होने वाली बैठक

obama and jinping

बीजिंग : अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा सोमवार की सुबह चीन की दो दिवसीय यात्र पर पहुंच गये हैं. ओबामा ऐसे समय में चीन की यात्र पर पहुंचे हैं, जब उनकी सरकार घरेलू मोर्चो पर दिक्कतों का सामना कर रही है. हाल में अमेरिका के कुछ मध्यावधि चुनाव में उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी को शिकस्त मिली और रिपब्लिकन ने बढ़त हासिल कर ली. अमेरिकी सीनेट में अब रिपब्लिकन का वर्चस्व हो चुका है और ओबामा को हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकनों का भी भरोसा हासिल करना होगा. बराक ओबामा वे 10 व 11 नवंबर को एशिया पैसेफिक इकोनॉमिक कॉरपोरेशन फोरम की बिजिंग में बैठक में शामिल होंगे. उसके बाद 13 नवंबर को वे म्यांमार में इस्ट एशिया सम्मिट में शामिल होंगे. ओबामा अपनी इस यात्र के दौरान 10 व 11 नवंबर को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी बात करेंगे. जानकारों के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच बातचीत का अहम मुद्दा समुद्री सुरक्षा होगा. दुनिया के दो बड़ी शक्तियों के शीर्ष नेताओं के बीच की इस मुलाकात पर अमेरिकी व चीनी जनता सहित पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं. खबरों के अनुसार, दोनों नेताओं के बातचीत का केंद्र बिंदु दक्षिण चीन सागर होगा, जिसमें चीन अपने एकाधिकार को किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं करता. ओबामा व चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यह बैठक भारत के लिए इस मायने में महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि भारत भी दक्षिणी चीन सागर में अपनी सक्रियता बढ़ाना चाहता है. वियतनाम के प्रधानमंत्री न्युन तंग जुंग जब पिछले पखवाडे भारत के दौरे पर आये थे, तो उन्होंने आपसी संबंधों को दुरुस्त करते हुए न सिर्फ पुराने प्राकृतिक तेल व गैस खनन करार को रिन्यू किया, बल्कि एक और नया समझौत किया. चीन की आपत्तियों को धता बताते हुए दोनों देशों ने दक्षिणी चीन सागर में आपसी सहयोग बढ़ाने का भी निर्णय लिया है. हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टो में कहा गया है कि हाल में चीन व वियतनाम के बीच तनाव कम हुआ है. इसके पीछे चीन की तेल कंपनी को वियतनाम द्वारा अपने तट पर काम करने की अनुमति देने को कारण बताया जा रहा है. लेकिन ज्यादातर जानकार इसे चीनी वर्चस्व ही मानते हैं और दिली संबंध इन दोनों देश में अब भी नहीं है. बराक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने अपने विदेश नीति का केंद्र बिंदु एशिया को बनाया. ओबामा के सामने बड़ी चुनौती यह है कि घरेलू के साथ कूटनीतिक स्तर पर बेहतर करते हुए 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में अपनी पार्टी के बेहतर प्रदर्शन के लिए जनता का विश्वास फिर से हासिल करना है. दुनिया की उभरती ताकत चीन के साथ ऐसे में ओबामा की कूटनीतिक वार्ता का असर घरेलू मोर्चे पर भी सीधे तौर पर देखा जायेगा. इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशिया की एक पारंपरिक रूप से एक महत्वपूर्ण ताकत है. इंडोनेशिया के सत्ता शीर्ष से आ रही खबरों के अनुसार, वह दक्षिण चीन सागर में अपनी अहम भूमिका निभाता रहेगा. दक्षिण चीन सागर में अपनी दखल बनाने के लिए अमेरिका को इंडोनेशिया के सहयोग की जरूरत होगी. उसकी भूमिका भी चीन के साथ संतुलन साधने में अहम है. उधर, थाईलैंड में मई में हुए सैन्य तख्ता पलट के बाद अमेरिका के साथ उसके रिश्ते प्रभावित हुए हैं और दोनों देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यास में कमी आयी है. चीन को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका को इन दोनों देशों को साधना होगा. वहीं, वाशिंगटन को हाल में कूटनीतिक मोर्चे पर कुछ सफलताएं भी मिली हैं. जैसे, इसी साल अप्रैल में अमेरिका व फिलीपिंस के बीच एक बड़े सैन्य उपस्थिति के लिए हस्ताक्षर हुआ है. जुलाई में जापान ने शांतिपूर्ण युद्ध में अमेरिका का साथ देने के लिए अपने संविधान में संशोधन किया है. जबकि वाशिंगटन आस्ट्रेलिया के साथ अपना रक्षा सहयोग बढ़ाने को राजी हो गया है. साथ ही भारत से 10 साल के लिए द्विपक्षीय सैन्य सहयोग समझौता का विस्तार हो गया है. अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों से आ रही खबरों के अनुसार, चीन के आक्रामक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए ओबामा एशिया में दबाव व सक्रियता बनायेंगे. साथ ही वे अपनी चिंताओं व असहमतियों पर खुल कर बात करेंगे.

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