बिहार में चार माह से मनरेगा का काम बंद, राज्य ने कहा- पैसा नहीं दे रहा केंद्र

बिहार में चार माह से मनरेगा का काम बंद, राज्य ने कहा- पैसा नहीं दे रहा केंद्र
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एक ओर बिहार सरकार प्रदेश में गरीबों की संख्या बढ़ाने को लेकर केन्द्र से राजनीतिक जंग लड़ रही है। वहीं गरीबों के लिए चर्चित मनरेगा का काम 24 मई से बिहार में बंद है। इस योजना के तहत औसत 50 लाख परिवार प्रत्येक माह राेजगार पाते हैं। राज्य सरकार की दलील है कि केन्द्र सरकार पैसा नहीं दे रही है। इसलिए, योजना ठप है। राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री नीतीश मिश्र का आरोप है कि केन्द्र का रवैया गरीब और मजदूर विरोधी है। उन्होंने कहा-काम शुरू करने के लिए हम तत्काल 550 करोड़ रुपए मांग रहे। करीब 375 करोड़ रुपए केन्द्र के यहां बकाया है। 300 करोड़ रुपए मासिक खर्च होते हैं।
जबकि, केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि पैसा बकाया होने के कारण काम बंद होने की बात गलत है। केन्द्र सरकार बिहार को 260 करोड़ रुपए देने के बाद से लगातार कह रही है कि पैसा लो तो, सही-सही हिसाब भी दो। हम मदद को तैयार हैं।
पर पात्रता तो चाहिए। लूट की छूट नहीं दी जा सकती। समय से उपयोगिता प्रमाण पत्र मिले तो बकाया भी मिलेगा। उपयोगिता प्रमाण पत्र में इतनी गड़बड़ियां होती हैं कि उसके आधार पर राशि स्वीकृत नहीं की जा सकती। देर से मजदूरी मिलने की  शिकायतोें और मजदूरी के नाम पर लाखों-करोड़ों की गड़बड़ी रोकने के लिए केन्द्र सरकार ई फंडिंग को बढ़ावा दे रही।
इससे राज्य को धन मिलते ही मजदूराें के बैंक खाते में राशि मिलने लगेगी। अफसोस है कि बिहार सरकार की इसमें रुचि नहीं है। दूसरी ओर, दरअसल, ग्रामीण मजदूरों को साल में 100 दिन तक रोजगार सुलभ कराने की इस योजना के तहत बिहार में औसत 45 दिन काम मिले हैं। राष्ट्रीय औसत 52 दिन है।  इस वर्ष मनरेगा के तहत 34 हजार करोड़ का केन्द्रीय बजट है। इसमें बिहार के हिस्से में 3000 करोड़ है।
मनरेगा में रोजगार और मजदूरी के फर्जीवाड़े की आम शिकायतों के बीच सरकार भी मानती है कि इस योजना के तहत निर्धारित न्यूनतम मजदूरी 172-177 रुपए दैनिक होने के कारण काम की मांग नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य कामों में मनरेगा से अधिक मजदूरी सुलभ होने के कारण लोग अत्यंत लाचारी में ही मनरेगा के काम से जुड़ते हैं। यही कारण है कि बिहार में 1.25 करोड़ मनरेगा जॉब कार्डधारियों में 72.5 लाख ने कभी काम के लिए निबंधन भी नहीं कराया।
20 लाख कार्ड ताे सरकार की नजर में ही फर्जी साबित हुए। परिवार के मुखिया के नाम दो-दो कार्ड बने थे। इनमें 16 लाख का सत्यापन हो चुका है। शेष का सत्यापन चल रहा है।  राज्य सरकार चाहती है कि प्रदेश के 1.26 करोड़ ग्रामीण बीपीएल परिवारों में सबों के नाम जॉब कार्ड बने। इसके लिए जनजागरण अभियान के तहत शनिवार को राज्य-भर के प्रखंड मुख्यालयों में मनरेगा मेला का आयोजन हुआ। इस तरह का आयोजन पहले भी हुआ है।
Source : Dainik Bhaskar

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