फिल्म रिव्यू: हैदर

फिल्म रिव्यू: हैदर

haider

फिल्म ‘हैदर’ के बाद विशाल भारद्वाज को लग रहा होगा कि गंगा नहा लिये। शेक्सपीयर के तीन सबसे चर्चित नाटक मैकबेथ, ओथेलो और हेमलेट पर पहले ‘मकबूल’ फिर ‘ओंकारा’ और  अब ‘हैदर’ बना डालना किसी फिल्मकार के लिए गंगा नहाने सरीखा ही है।  किसी फिल्म संस्थान की नजर से देखें तो विशाल भारद्वाज ने शेक्सपीयर ट्रायलजी को अपने नजरिये से श्रद्धांजलि देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। लेकिन अगर सिनेमाहॉल की पहली से लेकर मिडिल और रियर स्टाल के किसी दर्शक की निगाह से देखें तो  ‘हैदर’ में वो कशिश नहीं दिखती, जो इससे पहले ‘ओंकारा’ और ‘मकबूल’ में दिखती है। विशाल भारद्वाज के चिर-परिचित अंदाज में बनी ‘हैदर’ में कई अच्छी बातें हैं, लेकिन ये फिल्म सीट न छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर पाती। शायद इस बार विशाल उन दर्शकों को भूल गये, जो बीड़ी जलाईले.., नमक इस्क का.., ढैन टै ढ़ैन.. , झिन मिनि झिनि.., रू-ब-रू.. और धीमो रे..जैसे गीतों का मजा लेते रहे हैं, सीटियां बजाते रहे हैं। ‘हैदर’ की कहानी 1995 में कश्मीर के दर्दनाक हालात बयां करती है, जो एक तरफ सीमा पार से दहशतगर्दी के सितम झेल रहा था, तो दूसरी ओर कश्मीरियों और सेना के बीच आंतरिक कलह का दंश।
एक दिन डॉक्टर हिलाल मीर (नरेन्द्र झा) को सेना दहशतगर्दों का साथ देने के आरोप में गिरप्तार कर ले जाती है। कुछ समय बाद उसका बेटा हैदर (शाहिद कपूर) जब वापस लौटता है तो अपने घर को खंडहर की शक्ल में देखकर टूट जाता है। हैदर ठान लेता है कि वह अपने पिता को ढूंढ़कर रहेगा और अपनी मां गजाला (तब्बू) पर बुरी नजर डालने वाले से इंतकाम लेगा। इस काम में उसकी मदद करती है अर्शी (श्रद्धा कपूर), जो एक पत्रकार है और उसकी बचपन की दोस्त भी। एक दिन अर्शी को एक अनजान व्यक्ति मिलता है, जो अपना नाम रूहदार (इरफान खान) बताता है। वो अर्शी को एक फोन नंबर देकर कहता है कि हैदर को कहे कि वो उसे फोन करे, क्योंकि वह उसके पिता का पता जानता है। रूहदार से मिलकर हैदर को पता चलता है कि उसके पिता की मौत हो चुकी है और उनकी गिरफ्तारी एक साजिश थी, जिसमें खुर्रम (केके मेनन) और अर्शी के पिता का हाथ था।

फिल्म में कश्मीर की बरसों से चली आ रही सीमा पार आतंकवाद की समस्या के साथ-साथ लंबे समय से सेना की वहां मौजूदगी, सियासी हलचल, वायदे, चुनाव, बदलते-बिखरते हालात आदि पर भी फोकस किया गया है। शक की बिनाह पर सेना द्वारा पकड़े गये स्थानीय नागरिकों का गायब होना, पुलिस में उनकी गुमशुदगी की रपट दर्ज न होना, हमेशा शिनाख्ती कार्ड साथ रखने की अनिवार्यता, समय बेसमय नागरिकों की तलाशी आदि बातों को फिल्म में कहानी के साथ जोड़कर दिखाया गया है। ‘हैदर’ कई मायनों में एक अच्छी फिल्म है, लेकिन रंगमंच की छटा लिये यह एक आम दर्शक की पहुंच से कोसों दूर लगती है।

अभिनय की दृष्टि से ये शाहिद कपूर की अब तक की सबसे बढ़िया फिल्म कही जा सकती है। श्रद्धा कपूर को भी अभिनय का पूरा मौका मिला है। तब्बू और केके मेनन ने भी अपने काम बखूबी किये हैं। विशाल भारद्वाज ने इस अंदाज में कश्मीर की खूबसूरती को फिल्माया है कि उससे आप बर्फ पड़ने पर रजाई-गद्दों की सीलन महसूस कर सकेंगे। बावजूद इसके फिल्म में जो घुटन का एहसास है, उससे कभी-कभी दिल घबराने लगता है। दिल घबराने और बहलाने के बीच के अंतर को जो लोग समझ पाएं, यह फिल्म उनके लिए ही है।

कलाकार: शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, तब्बू, केके मेनन, इरफान खान, नरेन्द्र झा
निर्माता: विशाल भारद्वाज, सिद्धार्थ राय कपूर
निर्देशक-संगीत-संवाद-पटकथा: विशाल भारद्वाज
गीत: गुलजार

You must be logged in to post a comment Login