प्रख्यात पत्रकार संजीव झा द्वारा लिखित पुस्तक “जो जि़न्दगी बुनती है”

प्रख्यात पत्रकार संजीव झा द्वारा लिखित पुस्तक “जो जि़न्दगी बुनती है”

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 प्राक्कथन

”जो जि़न्दगी बुनती है“ यह एक पुस्तक अथवा कथा-कहानी आदि ही नहीं है, बल्कि यह एक उद्देश्यपरक जीवनी है, एक उदाहरण है, एक प्रेरणा है, मानवीयता का उत्कर्ष है, एक सामाजिक चिंतन है, एक जीवन दर्शन है और एक क्रांति है। ‘दीदी’ जो आज इन सभी उपाधियों का पर्याय बन चुकी हैं, उनकी जीवनी मात्र जीवनी नहीं एक सीख है। इनके बाद भी यह एक साहित्य है और सृजन है। भाई संजीव के रूप में एक क्षमतावान लेखक की छवि मुझे दिखी जब वे कहते है – ”सृजन की प्रक्रिया में सदैव पीड़ा होती है, परन्तु इस पीड़ा पर तो सैकड़ों आनंद न्योछावर हैं।“ साथ ही वे कहते हैं – ”हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना है कि हर अकेली औरत की आवाज़ महाभारत में रथ के टूटे हुए पहिये के साथ उस अभिमन्यु की तरह होती है जहाँ सैकड़ों महारथी उस अकेली निहत्थी आवाज़ को कुचल देना चाहते हैं“। यह चिंता, यह सोच और भावों के प्रकटन सहज ही लेखकीय गुणों का विस्तार करते हैं। मेरी उनको हार्दिक बधाई और कोटि-कोटि शुभकामनाएँ।
एक बहू, एक पत्नी, एक माँ और एक आसरा – क्या नहीं हैं ‘दीदी’। इनके उदात्त चरित्र को देखकर कोई भी मोहित हो सकता है। उनके संघर्ष की कहानी से कोई भी सीख ले सकता है। सच कहँू तो दीदी की हिम्मत और लगन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि मनुष्य यदि चाह ले तो आसमान को भी छू सकता है। कार्य के प्रति लगन और सच्ची निष्ठा होनी चाहिए। इसी कड़ी में यह पुस्तक एक मील का पत्थर साबित होगी, इसमें कोई दो राय नहीं है। यहाँ एक बात कहना आवश्यक प्रतीत होता है कि इसे मात्र एक कहानी के रूप में नहीं पढ़ना होगा। खुद लेखक के शब्दों में – ”इस अफसाने में मेरे पाठक अगर कभी अरुचि महसूस करने लगें तो मेरी गुजा़रिश है कि वे इसे अफसाना समझकर पढ़े ही नहीं, बल्कि उन्हें मानना चाहिए कि गागर में सागर कभी आ ही नहीं सकता।’ और मैं तो इससे भी दूर बात करना चाहता हूँ कि यह एक जीती-जागती तस्वीर है मानवीयता की, जीवन-संघर्ष की, बेसहारों को सहारा देने की, स्त्रियों को आत्म-सम्मान प्रदान करने की, उन्हें आत्मबल और आत्म-ग©रव प्रदान करने की, जीवन में सिर उठाकर जीवन जीने की ललक उत्पन्न करने की, एक आत्मीय भाव की, एक ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की, और भी न जाने कितनी तस्वीरें मुझे नज़र आती हैं। मुझे भरोसा है कि पाठकों को बहुत कुछ प्राप्त होगा, जो एक आम पुस्तक या किस्सागोई में उन्हें शायद ही मिले।
संजीव मेरे मित्र ही नहीं भाई की तरह हैं और उनकी लेखनी का यह जादू न जाने कैसे मुझसे अब तक अछूता था। वे पत्रकारिता में तो माहिर हैं ही और उन्होंने मिसालें भी कायम की हैं, लेकिन जो झलक मुझे इस पुस्तक में दिखी है वह भविष्य के लिए शुभ है। आज कम ही ऐसे साहित्यकार हैं जो अकेला ऐसा प्रयास करते हैं और साहित्य जगत में टिक पाते हैं। यह उन सबों के लिए शुभ हो यही मेरी कामना है।
यह पुस्तक एक चलचित्र की भाँति एक पटकथा को लेकर चलती है और कुछ उपलब्धियों के वर्णन के साथ समाप्त होते-होते एक सुन्दर संदेश छोड़ देती है, जो ग्राह्य है। इसे एक सुपाच्य भोजन की तरह हमें ग्रहण करना चाहिए ताकि समाज और देश का कल्याण हो। लेखक जब ये कहते हैं तो उनका उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है – ”मैं राजनीति विज्ञान का छात्र रहा हूँ और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान दो राजनीतिक चिंतकों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है – प्लेटो और कार्ल माक्र्स। इत्तेफाक से इन समाजवाद के दोनों प्रणेताओं के लिए सुख की कल्पना ‘लड़ाई’ थी। मैं प्लेटो और माक्र्स नहीं हूँ, पर मुझे भी लड़ना अच्छा लगता है।“ यही वह मूलमंत्र है जो किसी इंसान को जीवन को सफलता की सीढि़यों तक ले जाता है। यह लड़ाई लड़ने के अर्थ में नहीं है, बल्कि उस असीम संघर्ष के रूप में है, जो एक आम जन को हर रोज करना पड़ता है। जो इस संघर्ष में अटल रहता है, उसके लिए दुनिया सिर नवाकर चलती है। ‘दीदी’ ने भी यही किया है और संजीव भी वही कर रहे हैं। इसलिए भी संजीव बधाई के पात्र हैं।
सादर
विश्वजीत ‘सपन’

(भागलपुर जिले के नौगछिया अनुमंडल अंतर्गत तेतरी गाँव के निवासी कुमार विश्वजीत 1994 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के आन्ध्र प्रदेश कैडर के पुलिस अधिकारी हैं और वत्र्तमान में वहाँ एंटी-करप्शन ब्यूरो के निदेशक हैं तथा ‘सपन’ उपनाम से साहित्य जगत में एक समर्थ नाम हैं।)

अपनी बात
भागलपुर, फरवरी 2003. शायद तीसरा सप्ताह था। अचानक वहां के एक उर्दू अखबार से संबद्ध एक पत्रकार ने मुझे फोन कियाः ‘‘आपके लिए एक कम्पलीट स्टोरी है – एक सशक्त महिला का।’’
दरअसल, इस घटना से दसेक दिन पहले घंटाघर चैक पर चाय पीते वक्त मैंने उस पत्रकार से ख्वाहिश जाहिर की थी कि मैं एक ‘मदर इंडिया’ ढूंढ़ रहा हूं।
खैर, अफसाने की खोज में मैं उसकी बतायी जगह पर पहुँच गया। मैंने देखा कि एक अधेड़ महिला अपने थके कदमों से दौड़-भाग कर रही थीं। चेहरे पर वात्सल्य, पब्लिसिटी स्टंट से कोसों दूर और आॅंखो से अदम्य विश्वास: शायद ईश्वर ने ही उन्हें दीदी बनाकर भेजा था- मेरे और सबके लिए। कार्यक्रम खत्म हुआ और मैं लौट चला। परन्तु मुझे ऐसा लग रहा था कि मुझे मेरा पात्र मिल गया है।
तकरीबन, दस साल लग गए है: मुझे अपने इस पात्र को शब्द-चित्र में ढ़ालने में। कारण बड़ा सामान्य है- मेरे शब्द बौने हो जाते हैं! और शायद कम भी! क्योंकि किसी मुकम्मल शख्सियत को आप शब्दों की चाहरदीवारी में कभी कैद नहीं कर सकते।
दीदी ने अपने जीवन में सबकुछ जिया है – वैधव्य का कालकूट भी पिया है और सैकड़ों बेजुबान – बेसहारा महिलाओं की आवाज बनने का अमृत भी। अपने जीवन में असीम झंझावातों के बीच सदैव सफलता के आदर्श प्रतिमान तय किए हैं – दीदी ने।
मधुबनी जिले के दीप गाॅंव के षडानन बाबू की बेटी मनोरमा से सबौर की ‘सृजन दीदी’ बनने तक के इस अफसाने में कई पड़ाव और मोड़ हैं – पीड़ा और आनन्द भी। कभी वह गोसांईंगाँव ;भागलपुरद्ध के लाल साहब की बहू है, कभी राँची के लाख खोज संस्थान के वैज्ञानिक अवधेश कुमार की पत्नी है, तो कभी बेबी-पप्पू-बब्बू-मुन्नी-नन्ही-संजू की मम्मी। पर इन सब रिश्तों पर भारी है ‘दीदी’। हमारी, आपकी और सबकी दीदी।
वैसे यह कोई अफसाना या किस्सागोई नहीं है, पर जो भी है बड़ा सुकून और हिम्मत देने वाली बात है। वरना एक-दो सिलाई मशीनों के साथ एक तंग-संकरे घर से सफर शुरू करने वाली दीदी, आज स्वयं सहायता समूह और महिला सहकारिता के क्षेत्र में अपना नाम दर्ज न करा पातीं – वो भी सुनहरे हर्फो में।
नीम अंधेरे भिनसरवा से चप्पल घिसटती इस महिला ने सैकड़ों घरों में चिराग रौशन कर दिए हैं- आज सर्वत्र जय है। पर मैं तो अफसानानिगार हूँ यहां- सो मैं आपको दीदी के उस चप्पल घिसटने के समय हुए दर्द ;जो अब साइटिका हैद्ध से भी रू-ब-रू करवाऊँगा।
सृजन की प्रक्रिया में सदैव पीड़ा होती है, परन्तु इस पीड़ा पर तो सैकड़ांे आनन्द न्योछावर हैं। दीदी ने तो मानों इस पीड़ा को साध लिया हो – कभी मंा बनकर, तो कभी बहन बनकर तो कभी दादी-नानी बनकर। और तो और, एक अद्वितीय साहसवाली महिला की विजय गाथा को अफसाने का अमलीजामा पहनाने की प्रक्रिया में जब कभी मुझे थकान का आभास हुआ – मेरे पात्र ने ही मुझे आन्दोलित – प्रेरित किया।
इस अफसाने में मेरे पाठक अगर कभी अरुचि महसूस करने लगें, तो मेरी उनसे गुजारिश है कि वे इसे अफसाना समझकर पढ़े ही नहीं – बल्कि उन्हें मानना चाहिए कि ‘गागर में सागर’ कभी आ ही नहीं सकता। मुझे विश्वास है कि ‘‘जो जिन्दगी बुनती हैं’’ के आखिरी शब्द तक वे भी महसूस कर जाएंगे कि मनोरमा के दीदी बनने का सफर किसी को भी झकझोर कर रख देगा।
मैं शुक्रगुजार हॅंू उन सबका जो किसी न किसी रूप में दीदी से जुड़े हैं और लफ्जों के इस सफर में मेरी स्याही कभी खत्म नहीं होने देते।
संजीव कुमार झा
आनन्द भवन, सुपौल

मनोरमा का बालपन और अवधेश का मिथिला आगमन
सकरी-निर्मली रेलखण्ड पर झंझारपुर और तमुरिया स्टेशन के बीच एक गांव है दीप। वैसे तो यह गांव पमरिया ;बेटे के जन्म पर बधैया गाने वाली आदिम जनजातिद्ध और पान के लिए प्रसिद्ध है। किन्तु हमारी कथा आरंभ होती है इसी गांव के षडानन बाबू के घर से। यूं तो षडानन बाबू किसी सूत मिल में काम करते थे किन्तु होमियोपैथिक इलाज में भी उनको महारत हासिल थी। नतीजतन, दीप, तमुरिया, चिकना, झंझारपुर और घोघरडीहा गांव उनकी तूती बोलती थी।
षडानन बाबू के कुल छः बच्चे थे – चार पुत्रियाँ और दो पुत्र। उन्होंने इन बच्चों को बड़े जतन से पाला था और उन्हें सदैव पढ़ने-लिखने की ओर प्रेरित किया। षडानन बाबू का मानना था कि शिक्षा और संस्कार इंसान को भीतर से मजबूत बनाते है और इन्हीं गुणों की बदौलत वह प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अनुकूल बना सकता है। षडानन बाबू की सबसे बड़ी संतान का नाम था मनोरमा। बाल सुलभ, चंचलता के विपरीत मनोरमा की अभिरुचियां मिथिला पेंटिग और पुस्तकों में ज्यादा थी।
कहते हैं कि बेटी बढ़ते और आयु को घटते देर नहीं लगती। सो साल बीतते गए और आ पहुँचा सन् 1963। आखिरकार षडानन बाबू को अपनी मैथिली मनोरमा के लिए सुयोग्य वर मिल ही गया। भगवान की माया देखिए – वर का नाम भी अद्भुत था अवधेश। मेधावी अवधेश को जामाता के रूप में पाकर षडानन बाबू और उनकी पत्नी के पैर मानो धरती पर नहीं पड़ रहे थे। अवधेश के पिता लाल साहब भागलपुर जिले के गोसांईंगाँव के रहने वाले थे और वहीं सबौर कृषि महाविद्यालय में प्रोफेसर थे। अवधेश बचपन से ही मेधावी थे और विवाह के कुछ ही महीने बाद उनकी नियुक्ति राँची स्थित भारतीय लाख संस्थान में वैज्ञानिक पद पर हो गई। सन् 1967 में मनोरमा-अवधेश के घर एक बच्ची का जन्म हुआ। बच्ची के दादा ने प्यार से उसका नाम रखा बेबी। उसके कुछ वर्षों बाद 1969 में पप्पू का जन्म हुआ, 1971 में बब्बू, 1974 में मुन्नी, 1975 में नन्हीं और 1978 में संजू बाबा आए। अभी तक मनोरमा का जीवन में सिवाय सामान्य जीवन का अर्थाभाव छोड़कर कोई खास तकलीफ नहीं थी।
बच्चे बड़े होते जा रहे थे, जरूरतें मुँह बाएँ जा रही थीं और आय का स्रोत प्रतिदिन सिकुड़ता-सा महसूस हो रहा था।
1963 से 1990 यानी 27 वर्षों का यह सफर साधारण और सामान्य उबड़-खाबड़ वाले रास्तों का रहा। यानी वही स्कूल की फीस, नाश्ता-खाना और कपड़ांे की जरूरत पूरी करने की जद्दोजहद। इस ओर मनोरमा ने पति और ससुर की प्रेरणा से राँची में महिलाओं का एक संगठन बनाने की कई बार कोशिश भी की पर नतीजा सिफर से आगे नहीं बढ़ पाया।
1990 के बाद मनोरमा-अवधेश की चिन्ताएं थोड़ी और भी बढ़ गयीं। बेबी अब विवाह योग्य हो गयी थी। आर्थिक अभाव के बावजूद बेबी के लिए एक सुयोग्य वर मिल गया – मुजफ्फरपुर जिले के पहसौल गांव के बिमलेन्दु प्रसाद कर्ण। वे केन्द्रीय विद्यालय में विज्ञान के शिक्षक थे।
‘जो जिन्दगी बुनती हैं’ का यह कथा खंड यहीं खत्म करता हूँ, क्योंकि आने वाला समय पीड़ा और वनवास का दौर है। और शायद इस किताब का फलसफा भी आने वाला खंड ही तय करेगा।
प्रलय से साक्षात्कार
इंसान की जिंदगी और सूरज की गति, दोनों में कमोबेस एक साम्य है – डूबता हुआ सूरज हमें फिर उगने का एहसास कराता है और उगता हुआ सूरज अस्ताचल की ओर चल पड़ता है। ठीक इसी तरह इंसान की जिंदगी की गाड़ी अपनी पटरी पर जब सामान्य गति से चल रही होती है तो कई तरह की अदृश्य और अवांछित बाधाएं उसे या तो रोक लेती हैं या बेपटरी कर देतीं हैं।
मनोरमा को जिंदगी में भी – जो अबतक आम जिंदगी की परेशानी या जद्द¨जहद के बावजूद सामान्य गति से चल रही थी – एक तूफान आनेवाला था।
14 नवम्बर 1992 का वो मनहूस दिन! आज बाल दिवस था। यानी देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिन। मुन्नी, नन्हीं और संजू सुबह से अपने विद्यालय में होने वाले कार्यक्रमों की तैयारी में जुटे थे, पर उन्हें क्या मालूम था कि ऊपरवाला आज इन बच्चों की किलकारियों के प्रति बेरूखी दिखाने वाला था। सुबह से अवधेश बेचैनी और सीने में दर्द महसूस कर रहे थे। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और चार-पांच घंटे के कठिन संघर्ष के बावजूद जिंदगी हार गई। इसे महज दुर्योग ही कहेंगे की बाल दिवस के दिन ईश्वर ने मनोरमा-अवधेश के बच्चो ंको पितृहीन बना दिया।
अब मनोरमा के जीवन में अंधकार ही अंधकार दिख रहा था। एक अ¨र जीवन साथी से बिछुड़ने की असहनीय पीड़ा और उस पर पांच बच्चों को पालने की चिंता। यहंा मनोरमा के परिवार की कष्ती बीच भंवर में फंसकर डूबती दिखाई दे रही थी। बड़ा बेटा प्रणव पटना मेडिकल काॅलेज में एमबीबीएस द्वितीय वर्ष का छात्र था। ऐसी विकट और विपरीत परिस्थिति में अपनी मंा का सबसे ज्यादा ख्याल किया – मनोरमा के मझले बेटे प्रणय बब्बू ने। उसने न केवल कम उम्र में स्वर्गीय पिता के जगह मिले अनुकंपा की नौकरी के दरमाहे से परिवार की नैया चलाने की कोषिष की, बल्कि अपनी मंा को भी सदैव कुछ नया करने के लिए आंदोलित-उत्प्रेरित किया – ‘‘चलो चलें माँ सपनों की दुनिया में, कांटों से दूर।’’
जब कभी अपनी किसी प्यारी चीज को खो देते हैं, तो उस चीज के चले जाने के साथ ही हमारी आशा और यूं कहिए की हमारी जिजीविषा भी जाने लगती है। मनोरमा की सबकुछ बिल्कुल खत्म होने का एहसास हो चुका था- बावजूद इसके की उसने अपने पति के असामयिक निधन के पहले भी खुद महिला सहकारिता और उद्यमिता से कुछ करने का प्रयास किया था। हाँलाकि इन सब प्रयासों में वह कमोवेश असफल ही रही थी। खैर मिथिला की बेटियाँ विपरीत परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने के लिए कालातीत से जानी जाती है। सो मनोरमा ने भी अपने आँसुओं की नियंत्रित किया और अवधेश के स्मृति शेष इन बच्चों के लिए कुछ करने की ठान ली।
दिल त¨ र¨ता रहे अ©र आँख से आँसू न बहे,
इश्क की ऐसी रवायात ने दिल त¨ड़ दिया।
हारा हुआ इंसान कभी-कभी जीते हुए इंसान के लिए आदर्श प्रतिमान खड़े कर देता है, क्योंकि उसकी आशाअ¨ं में कई हरे-भरे द्वीप होते हैं और व्यथा के गहरे-फैले सागर में उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं होता।
‘जो जिदंगी बुनती हंै’ का यह अध्याय मनोरमा और उनके बच्चों के लिए गरम तवे पर चलने जैसा है। पर एक अफसानानिगार के नजरिए से मैं मानता हँू कि आने वाला वक्त यह तय कर देगा कि कटु माने जाने वाले नीम का स्वाद और सुगंध अंततः मधुर ही होता है। आखिर अब तक ‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाने वाली मदर इंडिया को प्रकृति ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया’ गाने का अवसर तो देगी ही।
कई हरे-भरे द्वीप हांेगे व्यथा के इस गहरे-फैले सागर में,
अन्यथा कोई थका-हारा नाविक ऐसी लम्बी यात्राएं न करता।

नीड़ का पुननिर्माण
स्थान विशेेष के अपने गुण होते है। इतिहासकारों ने भागलपुर को ‘सिटी आॅफ रिफ्यूजीज़’ कहा है। लेकिन इस ‘सिटी आॅफ रिफ्यूजीज़’ में कुछ तो अलग है, या यूं कहिए कुछ तो फाॅर्चून है कि इतने सारे रिफ्यूजीज़ यहां अपनी तकदीर आजमाने आते रहे हंै। सो, इस अफसाने के लिए भागलपुर को ‘सिटी आॅफ फाॅर्चुन’ कहना ही उपयुक्त होगा।
पति के निधन के एक साल बाद तक यानी 1993 तक मनोरमा राँची में रही, लेकिन इस जगह पर उसके साथ एक बड़ी दिक्कत थी – पति के साथ अतीत की स्मृतियां उसकी गति को षिथिल कर डालती थी। इस उहापोह से परेशान होकर मनोरमा ने आखिरकार भागलपुर यानी अपनी ससुराल को अपनी कर्मस्थली बनाने का निर्णय किया और आने वाले समय में यह सिद्ध हो गया कि किसी भी प्रकार के काम में ईष्वर हमें सहीं रास्ते पर डाल, हमारी मदद की षुरूआत करता है।
सबौर के कृषि महाविद्यालय – जहाँ मनोरमा के ससुर प्राध्यापक थे – के आसपास मनोरमा ने एक छोटे, तंग मकान से अपने सफर की षुरूआत की। इस घर में दरवाजे बेषक कमजोर रहे हों, पर इस माँ के इरादे किसी फौलाद से कम नहीं थे, खिड़कियां हवादार और रोषनीयुक्त न रहीं हो पर मनोरमा में जज्बे का तूफान और बच्चों की जिंदगी रौषन करने की तमन्ना जरूर थी। हमारे समाज की सबसे बड़ी विडम्बना है कि हर अकेली औरत की आवाज, महाभारत में रथ के टूटे हुए पहिए के साथ खड़े उस अभिमन्यु की तरह होती है जहां सैकड़ों महारथी उस अकेली निहत्थी आवाज को कुचल देना चाहते हंै या फिर उसकी जिजीविषा को हास्य का विषय बनाने लगते हैं। लेकिन पतिहीना मनोरमा के अदृष्य आँसुओं में कहीं न कहीं वो अदम्य उल्लास, षांति और बल था, जिस पर सफलता के सैकड़ों षाॅर्टकट न्यौछावर थे। कहते हैं कि जगज्जननी माता पार्वती को जबतक अपने आदि-स्परूप का आत्मज्ञान नहीं हुआ था, वह भी एक सामान्य महिला थीं। मनोरमा ने भी जीवन के झंझावातों के बीच अपने पाँव नहीं डगमगाए – सो वह भी जीवन की कटु-मधुर सच्चाईयों से रु-ब-रु थीं। जहाँ पति की स्मृतियों उसकी इच्छा-षक्ति को दृढ़तर बनाती थीं वहीं अपनी बगियारी में खिल रहें पांच फूल इस मालिन को सफलता की ओर प्रेरित कर रही थी।
बहरहाल, सबौर के उस छोटे घर से मनोरमा ने अपना सफर शुरू किया और सहकारिता के क्षेत्र में कुछ कर लेने की ठान ली। षुरू में आस-पड़ोस की महिलाएं भी जिनके लिए सहकारिता षब्द असामान्य था , भी मनोरमा से जुड़ने में गुरेज करती थी। लेकिन धीरे-धीरे मनोरमा के वात्सल्य और दृढ़ इच्छा-षक्ति के सामने उनकों यह लगने लगा कि इस काम में अगर कुछ नहीं भी हो तो नुकसान तो कतई नहीं है। इन आस-पड़ोस की महिलाओं के लिए मनोरमा ‘दीदी’ थीं।
कभी-कभी इंसान अपने गुण-विषेष के कारण विषेष नाम भी धारण करता है और यही उसकी पहचान हो जाती है। नहीं तो, भागलपुर की बहू 1993 में आस-पड़ोस की महिलाओं के लिए जो दीदी बनी सो पूरे इलाके के लिए आज भी ‘दीदी’ ही क्यों रह जाती?
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर,
लोग मिलते गए और कारवाॅं बढ़ता गया।
मुन्नी और सुनीता जैसे दसेक महिलाओं के धूप-घाम का संघर्ष अब मूर्त रूप लेने को तैयार था। अब प्रष्न था कि क्या रखा जाए इसका नाम? वरिष्ठ पत्रकार राघवेन्द्र, सहकारिता एवं स्वयं सहायता समूह विषेषज्ञ प्रणव कुमार घोष और मनोरमा के देवर सुनील कुमार ने कई दिनों तक इस विषय पर मंथन किया और इस संस्था के लिए नाम तय किया गया ‘सृजन’।
एकाध सिलाई मषीन और कुछ महिलाअ¨ं के द्वारा षुरू की गई यह सहकारी संस्था ‘स्ृजन’ अपने साथ एक नया पैगाम लेकर आई थी – जेन्डर इक्वेलिटी का। तभी तो भागलपुर के तत्कालीन जिला पदाधिकारी श्री टी. के. घोष ने एक सार्वजनिक सभा में कहा था कि ‘सृजन’ जैसी सहकारी संस्था अगर बिहार के सभी जिलों में खोल दी जाए तो राज्य की सूरत और सीरत बदलने में क¨ई समय नहीं लगेगा। षुरू में ‘सृजन’ का कार्य क्षेत्र सिलाई, बुनाई, कढ़ाई तक ही सीमित था, किन्तु जल्द ही भागलपुर के लोगों को एहसास हो गया कि कमजोर दिखने वाली इन महिलाओं के लिए सितारों के आगे और भी जहां हैं। 2000 आते-आते प्रषासन को भी यह एहसास हो गया कि इन महिलाओं की अनदेखी करना सामाजिक दायित्वों का पूर्ण-निर्वहन कहला ही नहीं सकता। आखिरकार वर्ष 2000 में भागलपुर के जिलाधिकारी श्री गोरेलाल यादव ने सबौर प्रखण्ड कार्यालय परिसर में स्थित ट्राईसेम भवन में सृजन को कार्य करने की अनुमति दे दी। इसके 1000 वर्ग फीट के विषाल भवन में समीति की कार्यषाला, प्रषिक्षण व सेमिनार हाॅल अवस्थित है। कार्यालय व कार्यषाला हेतु लगभग 50-60 कर्मचारीगण हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या 75 प्रतिषत से ज्यादा है।
इतना ही नहीं, सृजन पूर्णरूपेण कम्प्यूटरीकृत है तथा यहां कर्मचारियों में कार्यों का बंटवारा वे निरीक्षण वैज्ञानिक पद्धति से किया जाता है।
परिसर में ही भवन के समीप सृजन के पास 5000 वर्गफीट में फैला हुए एक हाॅल भी है, जिसमें एक तरफ 10 रूम है और दूसरी तरफ मसाला उत्पादन यूनिट।
संस्था ने सीधे गांव के भूखे प्यासे, ग्रामीण महिलाओं से सम्पर्क किया और अपनी व्यथा-कथा को याद करते हुए उन गरीब महिलाओं की भावना का उपासक बनकर उनकी आत्मा की आवाज को परखा, आँखों में नमी का एहसास किया और भोजन-वस्त्र जैसी प्राथमिक समस्याओं के साथ-साथ शैक्षणिक, नैतिक, सामाजिक, स्वास्थ्य, बचत, साख व स्वयं सहायता समूहों के संगठनात्मक पहलू के लाभ जैसे अन्य समस्याओं पर भी काम किया। यही कारण है कि आज सृजन महिलाओं के सर्वांगीण विकास की गौरवमयी संस्था के रूप में उभर कर सबों के बीच आयी है और महिलाओं के हित में निर्मित यह को-ओपरेटिव संस्था बिहार के सबसे अग्रणी संस्था की गिनती में हैं।
1995-96 में जहाँ 10 महिलाऐं सदस्य के रूप में जुड़ी थीं आज 18 वर्षों बाद अंष-धारियों व स्वयं सहायता समूहों के रूप में 4 से 5 हजार के बीच सदस्यों ने एक विषाल समूह आंदोलन का रूप ले लिया है। आज संस्था सिर्फ सबौर, गोराडीह व जगदीषपुर प्रख्ंाड में सीमित नहीं रहकर जिले के सभी महत्वपूर्ण 16 प्रखंडों में अपना अमिट छाप छोड़ चुकी हैं। संस्था से जुड़ी एवं महिलाओं को बचत एवं साख की सुविधा देने के निमित्त वर्ष 1997 से ’दि सेन्ट्रल को-ओपरेटिव बैंक लिमिटेड‘ भागलपुर से अपने कुषल प्रबंधन व विधि व्यवस्था के फलस्वरूप सम्वद्यता हासिल कर कुछ समय के अन्तर्गत 100 खाते से निरन्तर प्रयास व सेवा भाव के फलस्वरूप आज 2007 के अंतिम वर्ष तक लगभग 4000 खाता नामजद हुए और एक प्रतिष्ठात्मक लेनदेन हुआ जिसमें सरकारी गैर सरकारी दोनों सम्मलित हैं और उन्हीं की जमा पँूजी को बैंकिंग नियमानुसार जरूरत मदों को ऋण के रूप में बांटकर जहां गरीब महिलाओं को प्रषिक्षण एवं रोजगार देकर सृजन ने अपने पैरों पर खड़े होने की बात सिखाई, वहीं संस्था को भी प्रषासनिक-लाभ, भौतिक लाभ, नैतिक लाभ, संस्थागत लाभ व ख्याति मिली। यही कारण है कि संस्था के उत्पादित सामग्री में निरंतर बढ़ोतरी होती जा रही है जिसमें साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज, बिंदी, फूटमैट, बैग स्वेटर, पेन्टिंग-तस्वीर, दरी, बरी, पापड़, अचार, रेडीमेड गार्मेन्ट्स कसीदाकारी, सिल्क धागाकरण, तसर कटाई आदि इनके बिक्री केन्द्र में उपलब्ध होती है फिर बकरी पालन, सूअर पालन, दुग्ध उत्पादन, चटाई बिनाई तथा हैण्डलूम कम्बल बुनाई से सिल्क के विभिन्न प्रकार के कपड़े, सलवार सूट, चादर, साड़ी गमछा आदि का कार्य भी स्वयं सहायता समूह के कार्य के अन्तर्गत काफी लोकप्रिय रहा है। मिथिला प्रिंट हो या सिल्क कपड़ों पर कषीदाकारी व जरी या बारीकी से तराषी गई कलाकृतियाँ इन सभी का अनोखा संग्रह यहां नजर आता है।
इसके अलावा, गरीबों की आवाज को सरकार व जनता तक पहुँचाने हेतु सृजन माईंड पत्रिका और सृजन मासिक समाचार-पत्र का प्रकाषन भी महिलाओं की आवाज को जन-जन तक पहुँचाने का सकारात्मक कार्य भी क्रान्तिकारी कदम रहा है। महिला सषक्तिकरण दिवस के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम खेलकूद, राष्ट्रीय सेमिनार, षिक्षण व स्वाथ्य कैम्प आदि लगाना भी संस्था की उपलब्धि रही है।
कुछ वर्ष पहले, महिला सषक्तिकरण दिवस पर तीन-दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन बड़े धूमधाम से किया गया था जिसमें दर्जनों आई0 ए0 एस0, वरिष्ठ पदाधिकारी, राजनीतिज्ञ, समाजसेवी, लेखक बुद्धिजीवी आदि के साथ-साथ 3 से 4 हजार स्वयं सहायता समूहों के महिला सदस्यों ने भाग और शैक्षिक, स्वास्थ्य, रोजगार, खान-पान पर परिचर्चा का लाभ उठाया। जहाँ राष्ट्रीय सेमिनार में सोवेनियर व लघु उद्योग आधारित पत्रिका निकालकर काफी नाम अर्जित किया, वहीं दूसरी तरफ संस्था की गरीब महिलाओं व बालिकाओं में षिक्षा का अलख जगाने हेतु ढेरों कार्यक्रमों का आयोजन निरंतर करती रही है। बाल श्रमिकों के प्रति जागरूकता अभियान चलाकर नन्हें-मुन्ने बालक-बालिकाओं के भविष्य की चिन्ताकर इनके हित में अनकों कार्यक्रम किये गए।
हाल ही में कार्यकारिणी समिति की बैठक में एक अद्वितीय निर्णय लिया गया, जिसमें अनाथ बालिकाओं के लिए एक अनाथ आश्रम का संस्था जल्द ही शुभारंभ करेगी। संस्था ने उपेक्षा का दंष झेल रहे इन मासूमों को भविष्य में देष की मुख्यधारा में शामिल कर इनके सर्वांगीण विकास की कल्पना साकार करने का बीड़ा उठाकर सबों को चैंका दिया गया।
स्वास्थ्य षिविर – 24 फरवरी 2008 को एक स्वास्थ्य जागरूकता षिविर स्टेट बैंक और भागलपुर विष्वविद्यालय की सहभागिता से संस्था के परिसर में आयोजित किया गया जिससे गरीब खासकर सैकड़ों गर्भवती महिलाओं को काफी लाभ मिला। इस कार्यक्रम में कुलपति, तिलकामांझी विष्वविद्यालय भागलपुर, ए0 जी0 एम0 स्टेट बैंक, प्रधानाचार्या सुन्दरवती महिला काॅलेज, सिविल सर्जन सहित अन्य दर्जनों महिला डाॅक्टर व प्रोफेसर तथा बुद्धिजीवी सहित प्रेस – मीडिया के भी लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया ।
सृजन हैण्डलूम केन्द्र – समिति का अपना हैण्डलूम यूनिट है जिसमें महिलाऐं, प्रषिक्षित पुरूष कारीगर की सहभागिता से सिल्क कपड़ा, सलवार सूट कपड़ा, साड़ी, चादर, गमछा, लुंगी, सूती कपड़ा, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का तैयार किया जाता है। उत्पादन के अपेक्षाकृत मांग में निरंतर वृद्धि होने के उपरांत समिति ने कुषल प्रबंधन कर मांग, उत्पादन उसकी गुणवत्ता सहित ठोस वित्तीय प्रबंधन का सामंजस्य स्थापित कर एक मिसाल कायम किया है।

अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए दिन रात मेहनत कर सृजन की सचिव हजारों महिलाओं के सपने साकार करती नजर आ रही हंै। परिसर स्थित एक हाॅल है जहाँ दर्जनों महिलायें सिलाई, बुनाई, कटाई, कढ़ाई व अन्य रोजमर्रा कार्य में मग्न है वहीं दूसरी ओर कम्प्युटर प्रभाग में कुछ छात्रायें प्रषिक्षण प्राप्त करती और की-बोर्ड पर अँगुलियाँ थिरकाती नजर आती हैं, मानों उनमें आसमाँ छूने का जज्बा निहित हो।
उसी हाॅल में डाॅक्टर का एक केबिन बना हुआ है, जिसके बाहर डाॅ0 अंजना प्रकाष एम0बी0बी0एस0, स्त्री विषेषज्ञ का बोर्ड लगा हुआ है। जो अपना बहुमूल्य समय सप्ताह में 2 दिन देकर यहाँ की गरीब महिलाओं को चिकित्सा परामर्ष सेवा प्रदान करती हैं।
इसी हाॅल से सटे कैन्टीन के रूप में एक छोटा सा कमरा है जहाँ समिति की सेविका रेखा देवी और गीता देवी कर्मषाला, कार्यालय व अतिथि सेवा के लिए सदैव हाजिर रहती है और पानी-चाय देती नजर आती हंै।
समिति परिसर में लंबा-चैड़ा एक प्रदर्षनी सह बिक्री केन्द्र भी है जहाँ सृजन परिवार समिति द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों के द्वारा उत्पादित विभिन्न सामाग्रियाँ बिक्री के लिए शोभायमान है। सुसज्जित काउन्टर व कुषल प्रबंधन तथा कम्प्युटरीकृत रख-रखाव से यह शहर के किसी भी बड़े शो रूम से कम नहीं दिखती है। यहाँ रोजाना गुणवत्ता के आधार पर दर्जनों ग्राहक रोज पधारते हैं और इससे महिला कर्मचारियों का मनोवल सदैव बढ़ता ही रहता है। यहाँ शुद्ध-ताजा-सिल्क के कपड़े, सैम्पल के अनुसार डिजाईनिंग, कम लागत पर सामग्री की उपलब्धता एवं रेयर आईटम का होना ग्राहक को यहाँ आने के लिए मजबूर कर देता है। इतना ही नहीं समिति कमजोर वर्ग की महिलाओं का खास ध्यान रखकर उनकी क्रय शक्ति के अनुसार सामाग्री उपलब्ध कराती है, ताकि इस वर्ग की महिलायें भी लाभान्वित हों और सृजन के स्थायी क्रेता भी इससे सदैव जुडे रहे।
इससे सटा एक भंडार गृह है जहाँ लाखों मूल्य के कपड़े, प्रसाधन, गृह सज्जा सामग्री, खाद्य पदार्थ सामग्री, सैन्दर्यीकरण सामग्री, आदि कम्प्युटर का सहारा लेकर सदैव स्टाॅक को अपडेट रखा जाता है।ँ दो-चार भंडार पाल महिलायें हमेषा प्राप्ति, निर्गमन व सुयोग्य रख-रखाव का ध्यान रख तन्मयता से अपना काम करती नजर आती है।
परिसर में एक बैंकिंग प्रभाग भी है जो सेन्ट्रल को-आॅपरेटिव बैंक भागलपुर से सम्बद्ध है और स्वयं सहायता समूह के द्वारा, स्वयं सहायता समूह के लिए और सरकारी व गैर सरकारी के लिए भी कार्य करती है- विभ्न्नि प्रकार के खाते के लिए विभिन्न काउन्टर हैं जहाँ विषेषकर बचत खाता काउन्टर पर हर रोज की तरह आँखों में अरमान लिए, सपना लिए, कुछ महिलायें शाँत भाव से खड़ी अपनी बारी का इंतजार करती नजर आती हैं। वित्तीय व्यवस्था की सुरक्षा के लिए बंदूकधारी सिक्यूरिटी गार्ड भी चहल-कदमी करते बैंकिंग युनिट में दिखते नजर आते हैं ताकि बैंक व इसके ग्राहक को पूर्व सुरक्षा मिल सके। बैंक स्थित महिला कर्मचारीगण भी अपने कार्य में इत्मीनान से निर्वाह करती नजर आती हैं और सारा लेन-देन, व्यवस्था ठीक ठाक सुनिष्चित करने हेतु सेन्ट्रल को-आॅपरेटिव बैंक से अवकाष प्राप्त बुजुर्ग श्री जय प्रकाष झा भी मुस्तैदी से अपने अनुभव का इस्तेमाल करते नजर आते हैं।
परिसर में चट-पट, खट-खट, आवाज करती हैण्डलूम भी निर्बाध गति से चलती नजर आती है, जहाँ महिलाओं द्वारा प्रषिक्षित कारीगर के सहयोग से शुद्ध-ताजा-सिल्क कपड़े विभिन्न रूपों में उत्पादित किये जाते हैं और सिल्क नगरी के इस प्राथमिक व सराहनीय कार्य की भागीदारी में अपने समिति को नामजद करके धन्य हो आत्म-विष्वास से भरे पड़े नजर आते हैं।
परिसर में ही सचिव का वेष्म है, जहाँ वे चिन्तन-मनन कर अपने सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, शैक्षणिक आदि उत्तरदायित्व को बड़े सूझ-बूझ से निर्वाह करती दिखती हंै।
परिसर में अध्यक्ष भी अपने पृथक कमरे में कार्य करती नजर आती हैं। इससे सटे प्रषासनिक प्रबंधक का भी एक केबिन है, जहाँ से सभी कर्मचारियों पर निगाह रखा जाता है और कार्य-कुषलता को बरकरार रखने की कोषिष की जाती है। प्रबंधक (वित्त) भी परिसर में चहल कदमी करते नजर आती है जो प्रतिषतः बैकिंग प्रभाग में ही समय देती नजर आती है। परिसर में फील्ड सुपरवाईजर व सहायक फील्ड सुपरवाईजर भी कुछ बेसहारा महिलाओं की व स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को समझाते नजर आते हैं। गेटमेन आगन्तुकों की पहचान करते और आगमन रजिस्टर पर विवरणी लिखा हस्ताक्षर करवाते नजर आते हैं। जेनरेटर मेन बिजली गुल होने के प्रति जागरूक रहते हैं, पर कुछ न कुछ और कार्य भी करते रहते हैं। ड्राईवर भी अपने ड्यूटी के प्रति अत्यधिक सजग हैं।

संस्था के बाहर एस0 एच0 जी0 का कार्य:-
संस्था के परिसर तक ही इनका नाम सीमित नहीं रहता संस्था से दूर गाँवों में भी इनके क्रिया-कलाप का नजारा देखने को मिलता है, जो संस्था के सचिव की सोच-समझ की व्यापकता की ओर इंगित करता है। संस्था खुद व खुद ही बेगार व निर्धन महिलाओं के पास जाती है और उनके अभिरूचि व योग्यता के आधार पर उन्हें उस कार्य के लिए प्रोत्साहन ही नहीं, बल्कि कार्य को स्वरूप देने हेतु हर प्रकार की सहायता मुहैया करायी जाती हैं। चाहे वह प्रषिक्षण का हो या ऋण या अनुदान का, या अधिकार व कर्तव्य का, सचिव उन्हें खुद ही सारी जानकारी दे देती हैं। संस्था स्वरोजगार सृजन करने के लिए व एक वैचारिक व योग्य महिला के निर्माण के लिए कटिबद्ध है।
’सैकड़ों स्वयं सहायता समूहों‘ के लिए गाँव-गाँव जाकर, उनकी आत्मा की आवाज सुन उन्हें मुख्यधारा में लाने की मुहिम संस्था द्वारा जारी है, ताकि प्रत्येक घर स्वयं सहायता समूहों के अन्तर्गत संस्था के सहयोग से अपने पैरों पर खड़े हो सके और सुखी जीवन का निर्वाह कर जीना सीख सके।
स्वयं सहायता समूहों की एक विषाल टोली अलग-अलग जगहों पर सुविधानुसार सृजन के अन्तर्गत कार्य कर रही है जिसे कोई भी इस समूहों को या समूहों की महिलाओं को प्रत्येक या सभी को देखकर, उनकी आत्मविष्वास को देखकर, उनकी लगन-धैर्य-उत्साह को देखकर, उनकी वेष-भूषा व भाव को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली चबाए बिना नहीं रह सकता।
यूं तो सैकड़ों समूहों को तालीम देकर इस संस्था ने हजारों लाचार व गरीब महिलाओं को जीने की कला सिखायी है जिसे न तो शब्दों में समेटा जा सकता है, न ही इस अमिट कृति को पर्दे पर दिखाया जा सकता है।
सहिबगंज सृजन बिंदी उत्पादन केन्द्रः- दूसरी ओर इनका बिंदी उत्पादन केन्द्र भी है जहाँ महिलाओं का एक हुजूम इस क्रिया को मूर्त रूप देने में लगा हुआ है और वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन कर बाजार में अच्छी ख्याति प्राप्त कर रहा है। सृजन प्रषिक्षण केन्द्र ने अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए विषेष रूप से प्रषिक्षण मुहैया भागलपुर विष्वविद्यालय के समीप साहिबगंज मुहल्ला में एक वर्क शाॅप 2006 में शुरू किया, जो आज तक निर्बाध गति से चल रहा है। सृजन ने ज्यादा से ज्यादा महिलाओं/बालिकाओं को इस कार्य में अभिरूचि पैदाकर और रोजगार देकर एक मिसाल कायम किया है।
कम्पनीबाग-सृजन बिंदी उत्पादन केंन्द्र:-
इसी स्थल के समीप गरीब गुरूबो का एक और मुहल्ला है- कम्पनीबाग, जो मुलतः गंगा कटाव से विस्थापित परिवारों की आबादी से भरा है। विष्वविद्यालय के सामने सड़क के किनारे से ही इस गाँव का पूर्णतः अवलोकन किया जा सकता है और महसूस किया जा सकता है- इनके चेहरे पर गरीबी, लाचारी और अषिक्षा का भाव। मजदूरी करना ही इनकी जीविका है। पषुपालन भी कुछ हद तक इनके रोजगार के अंग हैं। महिलाओं का शोषण देख सृजन के टीम ने एक मुहिम चलायी और यहाँ भी इन्होंने कुछ महिलाओं को प्रषिक्षित कर रोजगार की गारंटी दी। आज यहाँ सैकड़ों महिलायें हैं, जो विभिन्न स्वयं सहायता समूह का निर्माण कर सृजन संस्था के अन्तर्गत संचालित है। सृजन उन्हें रोजगार के रूप में बिंदी-निर्माण, पषुपालन तथा सब्जी विक्रय के संबंध में कार्य का दिषा निर्देष देकर इन्हें ऋण के रूप में वित्तीय सहायता भी प्रदान की । आज नजारा यह है कि सैकड़ों घर की महिलायें निर्भीक रूप से पुरूषों के साथ-साथ चल रही हंै और पुरूष-वर्ग के द्वारा मान-सम्मान भी प्राप्त कर रही है।
संस्था द्वारा संचालित अन्य केन्द्र
सब्जी-बिक्री केन्द्र:- भारत के सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में कृषि की महत्ता को इस संस्था ने भी समझा और इसने कुछ महिला स्वयं सहायता समूहों को रोजगार की दृष्टि से इस व्यवसाय के लिए प्रेरित किया। आज इस स्वयं सहायता की सभी महिलाओं के आय में निरंतर वृद्धि से आत्म-विष्वास की झलक सहज ही देखी जा सकती है।
डेयरी उद्योगः- सृजन संस्था ने दुध की बढ़ती माँग और इसके बाजार को समझा और कुछ स्वयं सहायता समूहों को डेयरी उद्योग से जुड़ने के लिए तैयार किया और हर संभव मदद किया ताकि आय में वृद्धि होकर इन सबों के जीवन-स्तर में सुधार आये। गाय-पालन से जुड़े स्वयं सहायता समूह इस कार्य को करते हुए काफी खुष व सुखी नजर आते हैं।

बकरी-पालन:- बकरी पालन ग्रामीण गरीबों के बीच एक बहुत ही लोकप्रिय व्यवसायिक कार्य माना जाता है। कहावत भी है कि जब ऋण बढ़े तो बकरी पालें। इसी सिद्धांत को आधार मानकर संस्था ने भी कुछ स्वयं सहायता समूहों को इस व्यवसाय से जुड़ने की चाहत जगायी, प्रषिक्षित किया और हर प्रकार से मदद की। यह व्यवसाय अन्य पषुपालन की तुलना में काफी लाभप्रद है क्योंकि यह व्यवसाय कम पूँजी व लागत में आसानी से किया जा सकता है। इसलिए तो ग्रामीण विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास विभाग, नई दिल्ली से भी इस व्यवसाय को प्राथमिक व्यवसाय की स्वीकृति दी है। इस व्यवसाय से जुड़ी स्वयं सहायता समूह की महिलाएँ खुषहाल जिंदगी व्यतीत कर रही है।

तसर कटाई:- भागलपुर जिला सिल्क नगरी से विष्वविख्यात है। ’सिल्क उत्पादन व बिक्री‘ एक निष्चित समुदाय व वर्ग का जन्मजात व्यवसाय है । सृजन की स्वयं सहायता समूहों की कुछ टोली भी इस व्यवसाय से कैसे पीछे रहती। कुछ समूहों द्वारा इस व्यवसाय को भी बड़ी मुस्तैदी से प्रारंभ किया गया। अब सृजन द्वारा संचालित सिल्क उत्पादन-सह-बिक्री केंद न केवल इन ग्रामीण महिला बुनकरों की रोजी-रोटी का जरिया बन चुका है, बल्कि इन्होंने यह भी साबित कर दिया कि गाँव की गरीब महिलाऐं भी राष्ट्रीय आय की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ये महिलायें अपनी विरासत की व्यवसाय को शुरू कर अपनी प्राथमिक आवष्यकता की पूर्ति कर काफी खुष नजर आती हैं।

कम्बल-बुनाई व्यवसाय:- ठंड से ठिठुरती ग्रामीण-गरीब महिलायें अपनी पेट की भूख मिटाने और दूसरों को भी ठंड से मुक्ति दिलाने के लिए ’कम्बल‘ बुनती हैं और निरंतर इस कार्य में आत्मविष्वास के साथ जुटी रहकर सोचती हैं कि एक दिन ऐसा भी आए कि पेट की भूख और कंपकंपाती ठंड से दूसरों के साथ-साथ स्वयं को भी निजात दिलाया जा सके। सृजन संस्था इसी सपने को साकार करने और चुनौती देने हर तरह से प्रहरी बनकर दिषा-निर्देषक के रूप में खड़ी है, ताकि इसे स्वरूप दिया जा सके। इससे जुड़ी महिलायें इस व्यवसाय में निपुणता हासिल कर निरंतर प्रगति की राह पर आगे बढ़ रही हैं।

सिलाई-बुनाई:- मानव समाज की परिकल्पना बुनियादी चीजों में वस्त्र के बिना नहीं की जा सकती। वस्त्र की बात निकलते ही सिलाई-बुनाई स्वयं जुड़ जाता है। सिलाई-बुनाई का कार्य विषेष रूप से महिलाओं का कार्य ही माना गया है और महिलाओं में यह गुण स्वतः भी होता है और अगर ये ठान लें तो व्यवसाय की दृष्टि से प्रषिक्षण प्राप्त कर इस व्यवसाय से अपना जीवन-यापन कर सकती हंै। सृजन के सबौर स्थित कार्यषाला में भारी संख्या में महिलायें इस व्यवसाय का प्रषिक्षण प्राप्त कर इससे जुड़ने के बाद आर्थिक तंगी को अपने पास भटकने नही दे रही हैं।

पेंटिंग:- ’सृजन‘ ने पेंटिंग के क्षेत्र में भी काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है। यहाँ महिलायें सिल्क कपड़े पर मिथिला प्रिंट, मधुबनी प्रिंट, मंजूषा पिं्रट आदि प्रसिद्ध लोककलाओं की तस्वीरों से किसी भी कला प्रेमी को आष्चर्य चकित कर सकती हैं। चादर, पिलो कभर, आदि में भी इनके द्वारा उकेरे गये तरह-तरह के खुबसूरत व आकर्षक प्रिंट कर सबों का मन मोह लेती हैं। दर्जनों महिलायें इस कार्य द्वारा सृजन परिवार का अंग बनकर अपनी जीविका का निर्वाह कर खुष नजर आती है।

धागों से तस्वीर बनाना:- कला प्रदर्षन की झलक पेटिंग तक ही नहीं रहती। सृजन महिला विकास सहयोग समिति लि0 योग्य प्रषिक्षक से प्रषिक्षित कर धागे से हर प्रकार की तस्वीर बनवाकर और इसको व्यवसाय के रूप में विकसित कराकर सबों को चकाचैंध कर दिया। किसी की तस्वीर को छोटी-छोटी कील के सहारे धागे से पिरोकर बनाना किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। महान समाज सेवी मदर टेरेसा हांे या पूज्य बापू महात्मा गाँधी जी, या फिर संविधान निर्माता डा0 अम्बेदकर जी हों, या अन्य देवी-देवताओं या राजनीतिज्ञों की तस्वीर, महिलायें अपनी हस्तकला की बारीकी से स्पष्ट तस्वीर खींच देती हैं। आज आलम यह है कि महिलाओं के पास आर्डर ज्यादा है और समय का घोर अभाव। दिन-रात एक कर ये महिलायें आर्डर पूरा करने में अत्यधिक खुषी का अनुभव करती हैं।

कपड़े, रैक्सिन का बैग:- सृजन की महिलाऐं पुराने और नये कपड़े से बड़े-बड़े सस्ते दाम का बैग बनाकर सम्बन्धित व्यवसाय में एक क्रांति ला दी है। योग्य कारीगरों से प्रषिक्षित हो दर्जनों गरीब महिलाओं को इस कार्य में दक्षता हासिल है। कपड़े के साथ-साथ रैक्सिन के बैग का उत्पादन कर जहाँ ये महिलायंे संस्था के टर्नओवर में वृद्धि करती हैं, वहीं इस रोजगार से उनको खुद के जीवन-यापन में भी किसी प्रकार के संकट का सामना नही करना पड़ता है।

कषीदाकारी:- ’सृजन महिला विकास सहयोग समिति‘ की महिला कारीगरों द्वारा की गई कषीदाकारी सहजा ही किसी का भी ध्यान अपनी तरफ खींच लेती है। अब शहर के दूकानों में उपलब्ध कषीदाकारी वस्त्र इस संस्था में भी आसानी से देखी जा सकती है। यही कारण है कि शहर के भी कुछ दुकानों में इनकी कषीदाकारी वस्त्र की निरंतर माँग होती है और संतुलित व्यवसाय से महिलाओं को रोजगार भी मिलते रहते हैं। इस कार्य में भी आर्डर पूरा करने की जद्दोजहद लगी ही रहती है, पर ये महिलायें दिन-रात एक कर इन आर्डरों को पूरा करने में कभी जी नही चुड़ाती हैं।

फुड प्रोडक्ट कार्य:- ग्रामीण महिलायें कुछ फुड सामग्री का उत्पादन परंपरागत विधि से करती हैं, जिससे लागत कम होने से इस व्यवसाय में लाभ ज्यादा होता है। अचार, बड़ी, पापड़ जैम, जेली इस व्यवसाय के प्रमुख उत्पाद हंै। विभिन्न स्वयं सहायता समूह की महिलायें इन सामग्रियों का उत्पादन कर संस्था को आपूर्ति करती हैं, जिससे एक निष्चित रोजगार के तहत आजीविका का उपार्जन होता रहता है।

लाह कार्य:- संस्था से प्रषिक्षित होकर कुछ स्वयं सहायता समूह की महिलायें लाह उत्पादित सामग्री में अपना ध्यान लगाकर जीवकोपार्जन कर रही हैं। संस्था से हर प्रकार का सहयोग पाकर इनके कार्यों में प्रगति आयी है और इससे उनके जीवन-स्तर में भी वृद्धि हुई है। ये लाह सामग्री से लहठी, चूड़ी एवं गृह-सज्जा हेतु विभिन्न प्रकार के सजावट के सामान बनाती हैं। इसका बाजार भी अच्छा है और इससे जुड़ी महिलायें काफी खुष रहती हैं।

रेडीमेड गार्मेंट:- सिलाई-बुनाई में महारत हासिल करने वाली गरीब महिलायें रेडीमेड वस्त्रों की भी निर्माता बन गयी हंै और संस्था के शोरूम में इनकी एक अलग पहचान है। बच्चों का फ्राॅक हो या पैंट, टोपी हो या टी-षर्ट चटकीले-चमकीले देख काउन्टर पर आये ग्राहक उसे निहारते और खरीदे बिना नहीं रह सकते। इसके अलावे, सृजन के कारीगर महिलाओं के लिए ब्लाउज, पेटीकोट, आदि भी बनाती हैं। सृजन का यह रेडिमेड गारमेंट यूनिट फैषनेबुल परिधानों से भरा रहता है और यह युवा वर्ग के आकर्षण का केंद भी है।

स्वेटर बुनाई:- ठंढ का मौसम आते ही संस्था के प्रांगण में दर्जनों महिलाओं के हाथों में उनको काँटों और कुरूस के सहारे स्वेटर भी बुनते देखा जा सकता है। कुछ महिलायें सृजन हाॅल में स्वेटर बुनाई मषीन के सहारे बच्चे, बच्चियाँ, पुरूष व महिलाऐं के लिए रंग-बिरंगे आकर्षक डिजाईन का स्वेटर बुनती नजर आती हैं। इस कमाल के पीछे स्वयं सहायता समूहों के योग्य प्रषिक्षकाओं का हाथ है जो इन्हें अर्थोपार्जन के लिए रोजगारमूलक प्रषिक्षण देकर उनके जीवन स्तर को उठाती हैं।

मुर्गी पालन:- आज के खान-पान में चिकेन का महत्वपूर्ण स्थान है। लोग रूचि के अनुरूप विविध प्रकार की सामग्री अपने स्वाद के मुताबिक बनाकर खाते हैं-खिलाते हैं जिसके फलस्वरूप चिकेन की खपत एवं माँग बाजार में बनी रहती है। साथ ही साथ अंडे की भी खपत बाजार में ज्यादा होती नजर आती है। मुर्गी पालन का व्यवसाय बड़ी आसानी से कम पूँजी में ग्रामीण महिलाएँ कर सकती हैं और अधिक से अधिक लाभ कमा सकती हंै। सृजन ने इस ओर भी ध्यान दिया और कुछ महिलाओं को प्रोत्साहन एवं प्रषिक्षण देकर इस कार्य में लगाया। आज ये महिलायें अपनी पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी का मोहताज नहीं हैं।

आर्टिफिषियल ज्वेलरी:- वत्र्तमान में सोना-चाँदी से बने गहने काफी मंहगे हो गये हैं जिससे महिलाओं की क्रय शक्ति घट गई है। वैसे आज-कल के फैषन के दौर में लगभग सभी महिलायें सोने-चाँदी की अपेक्षा आर्टिफिषियल ज्वेलरी की ही खरीददारी करना पसंद करती हंै। सृजन की महिलायें भी इस कार्य-क्षेत्र में भी उतरकर आर्टिफिषियल ज्वेलरी की दुनियाँ में भी अपनी पहचान बना चुकी हैं। इस विभाग से जुड़े उत्पादों में पत्थर और मोती से बने गले का हार, बाला, चुड़ी झुमका हर रंग, हर डिजाइन में उपलब्ध है। नतीजतन, सृजन ने इस क्षेत्र में भी अपना प्रभुत्व कायम किया है।

कुछ स्थानों पर इस संस्था की अपनी दुकान भी है जो प्रदर्षनी के साथ-साथ संस्था की आमदनी को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है-
(1) सबौर बाजार:- सृजन परिसर में अपना शोरूम के अलावा संस्था का सबौर बाजार में भी परिसर एक बिक्री केन्द्र भी है जहाँ इस प्रखंड में स्थित कृषि विष्वविद्यालय, रेलवे, सबौर काॅलेज व डी0 पी0 एस0 व अन्य विषाल जनसमूह का यह शहर कुछ न कुछ रोजाना लेकर इस केन्द्र में जान फूँक देता है।
(2) नारायणपुर बाजार:- पीरपैंती और कहलगाँव के बीच घनी आबादी वाले इस कस्बे में संस्था का एक और बिक्री केन्द्र है। यहाँ संस्था द्वारा उत्पादित हर प्रकार की सामग्री का एक अपना बाजार बन चुका है और संस्था की आय में वृद्धि के साथ-साथ महिलाओं को रोजगार मुहैया कराने में भी अद्यतन सफल रहा है।
इतना ही नहीं, संस्था में कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देष्य से क्षेत्रीय अंगिका भाषा में षिक्षाप्रद कहानी पर आधारित टेली फिल्म का भी निर्माण किया-जिसमें ‘फुसरी’ व ‘दाँत का दर्द’ काफी लोकप्रिय हुआ।
इसलिए तो दैनिक हिन्दुस्तान समाचार-पत्र, दैनिक जागरण, आज, प्रभात खबर, माईंड पत्रिका, तापमान पत्रिका आदि में ही नहीं बल्कि अंग्रेजी दैनिक पटना-दिल्ली से प्रकाषित होने वाली टाईम्स आॅफ इंडिया ने भी इनके कृति को खूब सराहा।
इनकी सफलता का राज नम्रता, विष्वास, सषक्त संगठन, सुनियोजित कार्यक्रम, कुषल प्रबंधन, सैद्धांतिक पहलू, बेहतर प्रदर्षन व अनुकूल सपना बुनना और स्वरूप देना ही है। कभी किसी छोटे प्रखंड के छोटे से घर से अंकुरित होने वाला यह सृजन आगामी पीढ़ी के लिए यह राष्ट्रीय परिदृष्य में नये सतरंगी आयाम खोलेगा तथा अगली पीढ़ी इनकी कृति को बड़े आष्चर्य के साथ निहारेंगी, सराहेंगी और प्रेरणा लेकर जनसेवा की कल्पना के प्रति कटिबद्ध रहेंगी।
यहां से ‘सृजन’ की कहानी एक सक्सेस स्टोरी है – सिवाय मनोरमा के दीदी बनने के क्रम में हुई कुछ अपूरणीय क्षति के। पाँच-दस महिलाओं से षुरू हुए ‘सृजन’ के आज पाँच हजार से ज्यादा सदस्य हैं अ©र साढ़े चार सौ से ज्यादा स्वयं सहायता समूह इससे सम्बद्ध हैं। अठारह वर्षों के इस सफर में एक अकेली महिला ने पाँच हजार से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भरता का ऐसा पाठ पढ़ाया कि अब इनके पति इनकी स्वाबलम्बिता पर गर्व अनुभव करते हैं। कल तक अपने परिजनों के भरण-पोषण के लिए भटकने वाली मनोरमा आज कई घरों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनके घरों में आषा के दीप का ‘सृजन’ कर रहीं है।
षुरू में इन कार्यों में मनोरमा को विभिन्न तरह के संकटों का सामना करना पड़ा। परन्तु अब सहकारिता के क्षेत्र में ‘सृजन’ और ‘दीदी’ दोनों अतिविष्वसनीय ब्राण्ड हैं। कभी पति की मृत्यु के बाद अपने छोटे-छोटे बच्चों के लालन-पालन और उनकी पढ़ाई के लिए जद्दोजहद करने वाली यह दीदी, आज अपने वैज्ञानिक प्रबंधन और कुषल नेतृत्व के कारण बिहार स्टेट काॅपरेटिव बैंक के संचालक मंडल की निदेषक हैं। सृजन के अदभुत एवं साफ-सुथरे काम-काज को देखकर काॅपरेटिव बैंक भागलपुर से सम्बद्ध एक बैंक का जिम्मा भी उसे सौंप दिया गया है। इसके इतर काॅपरेटिव सोसाइटी जमा-वृद्धि के तहत इसे बचत और षाखा की सुविधा भी है और इसका सालाना ट्रांजैक्षन सात से आठ करोड़ रुपया है।
महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध यह सहकारी संस्था गरीबी की रेखा से नीचे रहकर गुजर-बसर करने वाले परिवारों कोे प्राथमिकता दी हैं। सम्प्रति सबौर एवं गौराडीह प्रखंड क्षेत्र के लिए यह समिति अन्य प्रखंडों की अपेक्षा अधिक सक्रियता से काम कर रही है।
हाल के सर्वे के मुताबिक इन दोनों प्रखंडों में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की संख्या क्रमषः 48.63प्रतिषत तथा 68.37 प्रतिषत है। निर्धनता की त्रासदी झेल रही यह एक बहुत बड़ी आबादी हैै। इनको स्वरोजगार उपलब्ध कराने तथा इनकी समृद्धि के लिए समिति ने स्वयं सहायता समूह का गठन किया है। चार सौ से अधिक समूह सम्प्रति क्रियाषील है, जो अपने परंपरागत विधाओंउद्योगों में वैज्ञानिक प्रषिक्षण प्राप्त कर उत्पादन एवं विपणन से जुड़ सके हैं।

यह समूूह सिल्क धागा कटाई का काम तथा बद्धी निर्माण का काम करती है। अपने उत्पाद का विपणन श्रावणी मेले में देवघर तथा वासुकीनाथ में बड़े पैमाने पर करके लगभग उतना लाभ अर्जित कर लेती है, जिससे समूह की महिलाएं सालोंभर आर्थिक रूप् से आत्मनिर्भर रहती हैं। समूह का बचत खाता समिति द्वारा संचालित बचत एवं साख प्रभाग में हैं। समूह की महिलाएं प्रत्येक महीने अनिवार्य रूप से 200 रूपए प्रतिमाह की दर से अपने खाते में बचत राषि जमा करती हैं तथा आवष्यकतानुसार ऋण प्राप्त करती हैं।
यहां यह उल्लेखनीय है कि सृजन महिला विकास सहयोग समिति लि0 द्वारा गठित एवं संचालित स्वयं सहायता समूहों को सरकारी अनुदान की निर्भरता से अलग रखने का प्रयास किया गया है। समिति द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि रिवाल्विंग फंड अथवा प्रोजेक्ट ऋण के साथ मिलने वाली सरकारी सब्सिडी को प्राप्त करने के लिए ही बहुत सारे जिले के अंतर्गत गठित हुए तथा सब्सिडी का लाभ मिल जाने के बाद समूह निष्क्रिय होते चले गए। समिति ने महिलाओं को यह समझाने का प्रयास किया कि स्वयं सहायता समूह बनाकर पराबलंबी दृष्टिकोण का त्याग किया जाना प्रथम षर्त होनी चाहिए। सरकारी सब्सिडी के रूप में मामूली रकम प्राप्त कर लेने से अािर्थक मजबूती की कल्पना बेमानी है। अतः समिति ने समूहों को आत्मनिर्भर होने के लिए सदैव अभिप्रेरित किया है, पराधीनता से वंचित रखने का प्रयास किया है तथा अपनी मदद आप करने की सलाह दी है, जो स्वयं सहायता समूह के नाम से सार्थक बनाता है।
ज्योति स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं बड़े पैमाने पर सुहाग से जुड़ी बिन्दी का उत्पादन एवं विपणन करती हैं। इस उत्पाद की मांग हमेषा पूर्ति की अपेक्षा अधिक होती है। फलतः अधिकाधिक लाभ अर्जित करने का इन्हें सालांे भर अवसर मिलता है।
चेतना स्वयं सहायता समूह की महिलाएं फल एवं सब्जी का उत्पादन तथा विपणन सालोंभर करती रहती हैं। सबौर प्रखंड अंतर्गत अवस्थित सरधो गांव की भूमि फल एवं सब्जी के उत्पादन हेतु काफी उपयुक्त है। बिहार कृषि वैज्ञानिकों का मार्गदर्षन सुलभ कराने के कार्य में समिति तत्पर रहती है।
ग्रामीण क्षेत्र की स्थानीय महिलाओं के सहयोग से समिति परिसर में अचार, बड़ी, आटा, सत्तू, दाल, बेसन एवं मसाले का उत्पादन एवं विपणन निरंतर चलता रहता है। गुणवत्ता से पूर्ण एवं किसी भी प्रकार के हानिकारक अवयवों से मुक्त यहां की खाद्य सामग्रियों की एक विषेष पहचान कायम हो चुकी है। एक बार प्रयोग कर लेने के बाद ग्राहक यहां खींचे चले आते हैं।
स्वयं सहायता समूह की महिलाओं का बचत खाता समिति में ही रखा गया है। समिति जमा वृद्धि योजना के तहत् बचत एवं साख का दायित्व निर्वहन कर रही है। समूहों को ऋण सुविधा हमेषा यहां उपलब्ध रहती है। समिति का दैनिक कार्यकाल प्रातः 10 बजे से संध्या 5 बजे तक है। समिति का अपना भंडार एवं बिक्री केंद्र भी परिसर अंतर्गत अवस्थित है। जहां सभी प्रकार के सिल्क एवं सूती वस्त्रों का विषाल भंडार है। समिति परिसर में हथकरघे लगे हुए हैं। जहां सिल्क एवं सूती वस्त्रों का उत्पादन लगातार होता रहता है। मिलावट रहित उत्पाद की मांग स्थानीय बाजार से लेकर बड़े षहरों तक बनी रहती है। फलतः दूर-दराज के षहरों से खरीदरों का आना-जाना लगा रहता है। समिति अपने इस उत्पाद की रंगाई का काम तथा उसे और आकर्षक बनाने हेतु कढ़ाई का काम अपने परिसर में ही करती है। समिति का अपना वर्कषाॅप है जहां सिलाई-कढ़ाई एवं स्वेटर बुनाई के साथ-साथ महिलाओं को प्रषिक्षित करने का काम सालोंभर चलता रहता है।
महिलाओं को कम्प्यूटर षिक्षण देने की व्यवस्था समिति ने की है। सृजन कम्प्यूटर कौषल उन्नयन कार्यक्रम के तहत यह व्यवस्था की गई है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, नई दिल्ली ने अपने काॅरपोरेट रिस्पान्सिबिलिटी स्कीम के तहत इसे अंगीकृत किए जाने का आष्वासन दिया था। तदनुरूप डी0 पी0 आर0 भी तैयार करवाकर प्रेषित किया जा चुका है। स्वीकृति की प्रत्याषा में प्र्रषिक्षण केन्द्र का उद्घाटन श्री नर्मदेष्वर लाल, भा0 प्र0 से0, माननीय जिलाधिकारी, भागलपुर के कर-कमलों से किया गया है तथा संचालन प्रारंभ हो चुका है।
समिति के द्वारा कृषि, पषुपालन तथा दुग्ध-उत्पादन के क्षेत्र में भी महिलाओं की सक्रिय भूमिका सुनिष्चित करवाई गई है। मजदूर, बटाईदार तथा भूमिहीन परिवारों को आज भी के0सी0सी0 अथवा अन्य वैसे ऋण वाणिज्यिक बैंकों से उपलब्ध नहीं हो सके हैं, जो उनके उत्पादन कार्य के लिए आवष्यक हैं। समिति ने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से उन परिवारों को अपने से जोड़ कर इन क्षेत्रों मे भी सूक्ष्मलघु ऋण के रूप में साख-सुविधा उपलब्ध कराने का काम किया है। इन क्रियाकलापों के माध्यम से इस क्षेत्र के निर्धनतम् खासकर महादलित परिवारों को काफी लाभ पहंुचा है।
समिति के सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन की भावना से स्वास्थ्य चेतना षिविर, महिला सषक्तीकरण सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जागरूकता षिविर, बैंकिग साक्षरता कार्यक्रम तथा रोजगारमूलक प्रषिक्षण एवं उत्पादन षिविर लगाकर आम जनजीवन के लिए पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से कार्य संपादित किया है। सर्वाधिक प्रसन्नता का विषय यह है कि महिलायें स्वयं सहायता समूह बनाकर एक क्रांतिकारी बदलाव लाने के लिए कटिबद्ध होकर अपनी रूचि के अनुरूप आर्थिक क्रिया-कलापों को अपनाकर उत्पादन एवं विपणन की ओर निरंतर अग्रसर है। महिलाओं को अपनी इच्छा-षक्ति को पहचानने तथा उन्हें मजबूती प्रदान करने की तकनीक मालूम हो चुकी है जो उनके सषक्तीकरण का आधार हैं।
कार्यक्षेत्र के अंतर्गत उपलब्ध कृषि उत्पाद फल एवं सब्जी सहित तथा दुग्ध के प्रसंस्करण पर समिति के अपना ध्यान केंद्रित किया है। समिति की सोच है कि स्थानीय उत्पाद का अधिकाधिक आर्थिक उपयोग किया जाय तथा संबंधित किसानोंमजदूरों को एस0 एच0 जी0 की महिलाओं के माध्यम से लाभान्वित किया जाय ताकि समाज के अन्दर महिलाओं के प्रति कृतज्ञता का भाव आदर के साथ स्वाभाविक रूप से प्रकट हो सके। जीवन-यापन के क्रम में यद्यपि महिलाओं की काफी बड़ी भूमिका सदा से रही है, बावजूद उसके आर्थिक गतिविधियों में उनकी प्रत्यक्ष़्ा सक्रियता परिलक्षित नहीं होने की वजह से वे निचले पायदान पर आज भी खड़ी हैं। इससे उबरने की आवष्यकता है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में हमारी ग्रामीण महिलाएं आज बहुत पीछे हैं। एक सर्वे के मुताबिक ग्रामीण आबादी का एक प्रतिषत भी इंटरनेट का उपयोग करना नहीं जान रहा है। समिति का लक्ष्य है कि अगले पांच वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी का लाभ ग्रामीण क्षेत्र में ष्षत-प्रतिषत लोगों तक मुहैया हो जाय जिसमें सक्रिय भागीदारी समिति द्वारा गठित एवं संचालित स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की हो।
समिति का वैधानिक अंकेक्षण निबंधक सहयोग समितियां, बिहार, पटना द्वारा अनुमोदित पैनल के सनदी लेखाकार द्वारा सम्पन्न किया जाता है। वर्षांत 31.03.2011 तक का वैधानिक अंकेक्षण संपन्न किया जा चुका है। वर्तमान वर्षांत 31.03.2012 का अंतिम लेखा तैयार किया जा रहा है। समिति के आर्थिक चिठ्ठे के अनुसार 7 करोड़ से अधिक राषि दिनांक 31.03.2011 तक जमा है। समिति के ये दायित्व पूर्णतया सुरक्षित हैं। समिति प्रत्येक वर्ष लाभ की स्थिति में रही है।
समिति चाहती है कि महिलाओं के लिए सरकार के माननीय मंत्रीगण तथा उच्चस्थ पदाधिकारीगण अलग से समय-समय पर सभा, गोष्ठी, सेमिनार था कार्यषाला का आयोजन कर महिलाओं के आत्मविष्वास में वृद्धि लाने का प्रयत्न करें। माननीय मुख्यमंत्री की विकास यात्रा के क्रम में कम से कम प्रत्येक जिले के लिए एक दिन का समय महिलाओं को उत्थान हेतु दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। यह प्रसन्नता का विषय है कि बिहार प्रान्त के इतिहास में पहली बार महिला सहकारिता सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस आयोजन का समाचार प्रसारित होते ही महिलाओं को आत्म-सम्मान का बोध होने लगा है। यह एक बहुत बड़ी बात है।
कामकाजी महिलाओं के लिए एक सुखद वातावरण में छात्रावास की व्यवस्था, उनके बच्चों के लिए पालना-घर तथा वृद्ध महिलाओं के लिए वृद्धाश्रम हेतु सरकार का ध्यान आकृष्ट होना तथा वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाया जाना नितांत आवष्यक है। पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए अलग से विषेष प्रकार की कल्याणकारी योजनाएं साकार करने से ही महिलाओं को सषक्तीकरण की कल्पना की जा सकती है।
सहकारिता विभाग के अलावे बिहार सरकार के अन्य विभागों से समय-समय पर प्राप्त मार्गदर्षन तथा स्थानीय जिला प्रषासन के प्राप्त संरक्षण ही समिति की सफलता के आधार में है।
यह ‘दीदी’ के ‘सृजन’ की दूरदर्शिता ही है कि जहाँ भारत सरकार ने इस वर्ष 2013 में सम्पूर्ण महिला बैंक बनाने की घोषणा की, वहीं ‘सृजन’ महिला विकास समिति अपनी बैंकिग जमा-वृद्धि योजना के तहत चलने वाले सात हजार से ज्यादा खाते वाले बैंक का देखरेख 1996 से यानी 17 साल पहले से ही महिलाओं से ही कराती है। कहने को तो काॅपरेटिव बैंक के अवकाश प्राप्त अधिकारी जयप्रकाश झा महिलाओं का मार्गदर्शन करते ह,ैं पर उन्हीं के अनुसार सभी काउन्टर्स पर रहने वाली इन महिलाओं को शायद ही कभी उनकी मदद की जरूरत होती है। यानी दीदी का यह बैंक भारत सरकार की योजना से लगभग सत्रह साल पहले से ही ‘‘आॅफ द वीमेन, बाय द वीमेन, फाॅर द वीमेन’’ की तर्ज पर क्रियाशील है।
कभी घर की चैखट के बाहर अपनी पहचान के लिए तरसती हुई सृजन की महिलाएं आज भागलपुर जिले के सोलह प्रखण्डों में अपनी क्वालिटी के झंडे गाड़ रही हैं। सृजन की सदस्यगण बैग, स्वेटर, सत्तू, पापड़, आचार, बिन्दी, दरी, सिल्क धागा, टसर रेशम जैसे अनगिनत सामान बनाती हैं। बाद में इन सामान¨ं की बिक्री की जाती है और इनकी बिक्री से मिले लाभांश को इन महिलाओं द्वारा आपसी समझ के साथ बाँट ली जाती हैं। इसे ‘सृजन’ की गुणवत्ता कहिए कि अब बड़े-बड़े व्यवसायी खुद आकर इन सामानों की खरीदारी करते हैं। कई मौकों पर तो दुकानदार सामानों की बुकिंग पहले ही करा लेते हैं।
इधर संस्था के कई नये क्षेत्रों में जुड़ने और इसके सदस्यों की संख्या बढ़ने के कारण इन महिलाओं द्वारा बनाई गई इन सामग्रियों में भी इजाफा होता जा रहा है। यह संस्था अब कढ़ाई, सिलाई, बुनाई, बकरी पालन, गौ पालन जैसी विधाओं का प्रशिक्षण भी दे रही है। हाल ही में सृजन ने गामीण क्षेत्र की महिलाओं के लिए चिकित्सा क्षेत्र में भी निःशुल्क परामर्श एवं सेवाएं देनी शुरू की है।
मनोरमा से दीदी के सृजन की यह विजय गाथा जहाँ मानवीय मूल्यों के आदर्श की एक जीवंत बानगी ह,ै वहीं समाज के लिए भी इसने एक सहकारी मंत्र दिया है – ‘अपने लिए जिये तो क्या जिये, ऐ दिल तू जी जमाने के लिए।’ कभी नीम अंधेरे भिनसरवा से चप्पल घिसटती दीदी ने आज सबकुछ पा लिया है। किन्तु साइटिका, डायबिटीज, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के बावजूद हाड़़-मांस की बनी इस लौह महिला के पथ का उद्देष्य किसी श्रान्त भवन में टिकना नहीं है – किन्तु उस सीमा पर पहुंचना है जिसके आगे शायद नारी सशक्तीकरण की कोई राह नहीं !
दीदी का बड़ा बेटा प्रणव आज आॅस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैण्ड हाॅस्पिटल में छाती एवं क्षय रोग विषेषज्ञ है, वहीं छोटा बेटा अमित अपने स्वर्गीय पिता डाॅक्टर अवधेश कुमार के नाम पर एक प्रबंधन काॅलेज चला रहा है। थोड़े ही समय में उसने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते हैं। दूसरा दामाद प्राणजीत राईट्स कम्पनी में इंजीनियर ह,ै तो छोटा दामाद दिवाकर केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कम्पनी कमांडर है। किन्तु मनोरमा से दीदी बनना तो कैवल्य-सा था – जहाँ माँ, सास, बहन, बहू, बेटी जैसे सब रिश्तों पर भारी पड़ गई दीदी की यह उपाधि। अब तबीयत खराब होने पर जब बेटे-बहू और बेटी-दामाद आराम करने की सलाह देते हैं, तो दीदी का जवाब किसी निर्मोहिनी मंा से कम नहीं होता – ‘‘ अभी बहुत काम बाकी है’’।
पर प्रश्न है किसके लिए और क्यों अब इतना कुछ करती हैं दीदी ? सदानन्द बाबू की बेटी, लाल साहब की बहू, डाॅक्टर अवधेश की पत्नी और बेबी-पप्पू-बब्बू-मुन्नी-नन्हीं-संजू की माँ के पास इसका जवाब नहीं है। अगर किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर है तो वह है – केवल और केवल दीदी, जिसने असहनीय पीड़ा के बावजूद अपने अदम्य साहस से हजारों घरों के चिराग रोशन कर दिये।

पुनष्च
मैं राजनीति विज्ञान का छात्र रहा हूँ और दिल्ली विष्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान दो राजनीतिक चिन्तकों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है – प्लेटो और कार्ल माक्र्स। इत्तेफाक से, समाजवाद के इन दोनों प्रणेताओं के लिए सुख की कल्पना ‘लड़ाई’ थी। मैं प्लेटो और माक्र्स नहीं हूँ, पर मुझे भी लड़ना अच्छा लगता है। प्लेटो और माक्र्स की लड़ाई भिन्न थी और मेरी लड़ाई भिन्न है। उनकी लड़ाई समाज से थी और मेरी लड़ाई खुद से है। यह लड़ाई कभी खत्म नहीं होगी और इसे कभी खत्म होनी भी नहीं चाहिए। मैं लड़ता हूँ अपनी लेखनी के पात्रों से। ‘जो जिन्दगी बुनती हंै’ में मैंने मनोरमा देवी यानी दीदी पर लिखा है। मैंने इस विषय को ही क्यों चुना? बहुत धीमे से आप सबों के कानों में फुसफुसा रहा हूँ- ‘‘ इस किताब को मैंने नहीं लिखा। इस किताब को लिखने के लिए मुझे केवल माध्यम बनाया गया है।’’
मुझे माध्यम किसने बनाया और क्यों बनाया? इन प्रष्नों के जवाब के लिए आप में से प्रत्येक को यह किताब पढ़नी होगी।
रामकृष्ण परमहंस की एक प्रसिद्ध बांग्ला उक्ति है, ‘जतो दिन बाचि, ततो दिन षिखी’ अर्थात जितने दिन जियूँगा, उतने दिन सीखूँगा। ठाकुर बाबा के इस वचन को प्रमाण मानकर मैं भी अपनी आखिरी साँस तक सीखने का प्रयास करूँगा। छोटे-बड़े सभी से सीख रहा हूँ और सृजन करने का प्रयास कर रहा हूँ।
विवेकानंद ने कहा था, श्भ्म ूवतो इमेजए ूीव ूवतो ूपजीवनज ंदल उवजपअम दृ दमपजीमत वित उवदमलए दवत वित ंिउमए दवत वित ंदलजीपदह मसेमण्श् यानी लिप्सारहित कर्म ही सर्वश्रेष्ठ कार्य है। दीदी का जीवन भी विवेकानंद की इस उक्ति में ही निहित है। अन्यथा सृजन कार्यालय परिसर में से डाँट लगाने वाली इस महिला को यह भी पता है कि किस कर्मचारी के पति या सास की तबियत खराब है, किसके बच्चे के स्कूल की फीस समय पर नहीं भरी जा रही है। और तो और, दीदी को यह भी पता होता है कि सृजन से जुड़ी इन चार हजार महिलाओं में किसके घर में कितने पल्ले नई-पुरानी साडि़याँ हैं। सफलता के षिखर पर भी इनकी याद्दाष्त और वात्सल्य अद्वितीय है।
पतंजलि ने कहा है, ‘ महावृक्ष बनने के लिए जिस तरह हर बीज को लगभग सड़ना पड़ता है, इसी तरह ईष्वर से एकरूप होने के लिए प्रत्येक जीवात्मा को अवनति की अवस्था से गुजरना पड़ता है।’ 1996 में मनोरमा ने जो बीज रोपा था, वह सृजन के रूप में आज एक महावृक्ष बन चुका है, और इसी प्रक्रिया में मनोरमा ‘दीदी’ बन गई। ईसा मसीह ने कहा था-श् ज्ीमतम पे दवज तमंेवद जव ूीलए जीमतम पे इनज जव कव ंदक कपमण्श् दीदी की जीवनयात्रा भी हमें यह बताती है कि हम क्यों और कैसे जैसे प्रष्नों में उलझे नहीं- कर्म करो और कर्म करते हुए कत्र्तव्य पथ पर गतिषील रहो। इतनी शक्ति पैदा करो।
‘ हम न तो दुःख के शोधार्थी है न सुख के।
हम खोज रहे हैं केवल मुक्ति
हमारा सारा संघर्ष मुक्ति के लिए है।‘
संजीव कुमार झा

उपसंहार
अनुज संजीव की इस प्रथम कृति के लिए उपसंहार लिखना मेरे लिए आसान नहीं था, विषेषकर उनके इस रचना की नायिका के संघर्षमयी रचनात्मक जीवनयात्रा को देखते और मानसिक रूप से अनुभव करते हुए। पर उनके बालरूपी हठ एवं ‘दीदी’ के उदात्त चरित्र तथा उनके सामाजिक दिग्दर्षिता से विवष हो मना नहीं कर सका।
वर्षांे हो गए बिहार के किसी लेखक की रचना में समग्रता एवं रचनात्मकता का मिश्रण देखे हुए, जो दिनकर, रेणु तथा बेनीपुरी जी की कृतियों में दिखती हैं। ग्राम्य षब्दों का प्रयोग भी, अब बीते दिनों की बात हो गयी। इस कृति में प्रयोग किये गए षब्द यथा ‘भिनसरवा’ ‘पमरिया’ तो अब मिथिलाचंल तो क्या पूरे बिहार के ग्रामीणों के ष्षब्दकोष से ही संभवतः विलुप्तप्राय हो गए है। बहुत दिनों पष्चात् संजीव की लेखनी द्वारा इन्हेें पुनर्जीवित करना मेरे लिए एक सुखद आष्चर्य है। पमरिया या पामरिया नाम की एक उपजाति होती थी जिनकी कार्य था बच्चों के जन्म के पष्चात उस घर में जाकर बधाई-गान गाना। मैंने अपने बचपन में कई बार उनके नृत्य एवं गान का आनंद लिया है। उनके आने पर पूरे गांव की निमंत्रण दिया जाता था और आयोजन खत्म होने के पष्चात वस्त्र, आभूषण तथा अनाज या पैसे दे विदा करने की प्रथा थी। कई जगहों पर मैंने बड़ी-बूढ़ी महिलाओं द्वारा उनके पाद-प्रक्षालन एवं चरण-वंदना करते भी देखा है, पर अब बदलते सामाजिक परिप्रेक्ष्य में वे भी प्रायः विलुप्त से हो गए हैं। नयी पीढ़ी द्वारा उनके लिए प्रयुक्त ‘नट’ नाटनियंा या ‘भाट-भाटिन’ ष्षब्द सुनकर एक ठेस सी लगती है पर संभवतः यह भी यांत्रिक एवं भौतिक परिवर्तन की देन है, हमारी नई पीढ़ी की। इसमें हम केवल ‘धृतराष्ट्र’ की भूमिका ही निभा सकते हैं।
मनोरमा से ‘सृजन दीदी’ तथा मधुबनी के दीप गाँव से नौगछिया के गोर्सांइंगाँव होते हुए भागलपुर के सबौर तक की जीवन यात्रा एक ग्राम्यबाला के लिए कैसी रही होगी, इसकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं। यात्रा जैसी भी रही हो पर यात्रा का अंतिम पड़ाव अत्यंत ही सुखद रहा है उन हजारों परिवारों के लिए जो आज एक सम्मान का जीवन जी रहे हैं और उन्हें देखकर जो संतोष प्राप्त होता होगा ‘दीदी’ के मन में, वह निष्चय ही अकल्पनीय है। संजीव के षब्द समीचीन प्रतीत होते हैं जब वे कहते हैं ‘सृजन में पीड़ा होती है परन्तु इस पीड़ा पर सैकड़ों आनंद न्योछावर हैं।’
ऐसे चरित्र को प्रकाष में लाने के लिए संजीव बधाई के पात्र हैं। आषा करता हूँ कि भविष्य में भी अपने लेखनी द्वारा समाज में छिपे हुए कर्म-योगियों को प्रकाष में लाते रहेंगे।
शुभकामनाओं सहित,

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