अन्नाद्रमुक सुप्रीमो और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को सजा

अन्नाद्रमुक सुप्रीमो और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को सजा

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अन्नाद्रमुक सुप्रीमो और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता के सियासी भविष्य पर शनिवार को ग्रहण लग गया। बेंगलूर स्थित विशेष अदालत ने उन्हें तीन अन्य के साथ 18 साल पुराने आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में दोषी करार दिया। कोर्ट ने सभी दोषियों को चार-चार वर्ष कैद की सजा सुनाई। साथ ही जया पर 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया। यह देश में किसी नेता पर लगाया गया सबसे बड़ा जुर्माना है। जया पहली ऐसी मुख्यमंत्री हैं जिन्हें पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के मामले में सजा सुनाई गई है। चूंकि सजा तीन वर्ष से अधिक की है, लिहाजा विशेष जज जॉन माइकल डिकुन्हा के फैसला सुनाते ही जयललिता समेत सभी दोषियों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया। इस फैसले के साथ ही अन्नाद्रमुक सुप्रीमो की मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन जाएगी। उनकी विधानसभा की सदस्यता तो फैसले का एलान होते ही समाप्त मान ली गई।सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद किसी आपराधिक मामले में विधायक-सांसद दो वर्ष या इससे अधिक सजा मिलते ही अपनी सदस्यता खो बैठते हैं। लालू यादव, रशीद मसूद और जगदीश शर्मा के साथ ऐसा ही हो चुका है। अगर जया को आगे राहत नहीं मिली तो उन्हें 10 साल तक चुनावी राजनीति से बाहर रहना पड़ सकता है। जया को जिस मामले में सजा सुनाई गई वह बतौर मुख्यमंत्री उनके पहले कार्यकाल (1991-96) का है। इस दौरान उन्होंने एक रुपये सालाना वेतन लेने का एलान कर रखा था। 66 साल की जया को अज्ञात स्रोत से 66.65 करोड़ रुपये की संपत्ति अर्जित करने के आरोप में विशेष जज डिकुन्हा ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के प्रावधानों के तहत उपरोक्त सजा सुनाई। अदालत ने अन्नाद्रमुक सुप्रीमो की करीबी शशिकला नटराजन, उनकी भतीजी इलवराशी और भतीजे सुधाकरन को भी इस मामले में बराबर का दोषी करार दिया। एक समय जया ने सुधाकरन को अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था, लेकिन बाद में उन्हें बेदखल भी कर दिया था। जया की तरह इन सभी को भी चार-चार वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई है। इन तीनों पर दस-दस करोड़ का जुर्माना लगाया गया है। सरकारी वकील भवानी सिंह के अनुसार अन्नाद्रमुक सुप्रीमो समेत सभी दोषियों को जमानत के लिए कर्नाटक हाई कोर्ट में अर्जी दाखिल करनी होगी। सियासी दृष्टिकोण से संवेदनशील मामला होने के कारण परपन्ना अग्रहरा जेल परिसर में ही बनी अस्थायी अदालत में फैसला सुनाया गया। इस दौरान जयाललिता समेत अन्य मौजूद थे। सुरक्षा कारणों से जेल के करीबी इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया था, लेकिन शनिवार सुबह से ही भारी संख्या में अन्नाद्रमुक समर्थक जेल के बाहर डटे थे। लंच से पहले अदालत ने जैसे ही जयललिता को दोषी करार दिया, अन्नाद्रमुक समर्थक उग्र हो गए। उन्होंने जेल के बाहर डीएमके प्रमुख करुणानिधि और इस मामले को उठाने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का पुतला फूंका। उग्र समर्थकों ने जेल परिसर के बाहर जमकर नारेबाजी की। बाद में शाम को जब सजा सुनाई गई तो उस समय भी अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं का गुस्सा चरम पर था। उन्हें काबू में करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग के साथ काफी मशक्कत करनी पड़ी।

तमिलनाडु में ¨हसा

अन्नाद्रमुक सुप्रीमो की सजा का एलान होते ही पार्टी कार्यकर्ता जयललिता जिंदाबाद का नारा लगाते हुए सड़कों पर उतर आए। कार्यकर्ताओं ने अपना गुस्सा सरकारी और निजी वाहनों पर उतारा। कई दुकानों और सार्वजनिक संपत्ति को आग के हवाले करने के साथ टीवी चैनलों से जुड़े मीडियाकर्मियों पर हमले कर उनके कैमरे तोड़ दिए गए। कई लोग घायल हुए हैं। चेन्नई और राज्य के दूसरे हिस्सों में दुकानों को जबरन बंद करा दिया गया। कुछ समर्थकों ने आत्मदाह करने की असफल कोशिश की। चेन्नई स्थित करुणानिधि के आवास पर भी अन्नाद्रमुक समर्थकों ने पथराव किया। इसी प्रकार सुब्रमण्यम स्वामी के पुतले भी जगह-जगह फूंके गए और चेन्नई स्थित उनके घर के बाहर प्रदर्शन हुआ।

2001 में भी गई थी सीएम की कुर्सी

यह पहला मौका नहीं जब जयललिता को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। इससे पूर्व 2001 में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के फौरन बाद उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की तत्कालीन राज्यपाल फातिमा बीवी द्वारा जया को शपथ ग्रहण कराने की पूरी कार्यवाही को ही रद कर दिया था। शीर्ष अदालत का कहना था कि चूंकि जया को तांसी भूमि घोटाले में दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा मिली हुई है, लिहाजा उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई जा सकती। उस समय जया ने अपने करीबी ओ पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बनवा दिया था, लेकिन फरवरी 2002 में मद्रास हाईकोर्ट से सभी आरोपों से बरी होने के बाद उन्होंने फिर से सीएम की कुर्सी संभाली थी।

मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में कदाचार का आरोप:

जयललिता पर 66 करोड़ से ज्यादा आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप है। 1991 से 1996 के दौरान मुख्यमंत्री के तौर पर पहले कार्यकाल में आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप लगाया गया है। जयललिता के साथ इस मामले में दो और लोग अभियुक्त हैं। 18 साल से लंबित इस मुकदमे में शनिवार को बेंगलूर की विशेष अदालत फैसला सुनाएगी।

मामले में कब क्या हुआ

14 जून 1996: डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने जयललिता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

21 जून 1996: प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उनकी शिकायत पर जांच के लिए आईपीएस लेतिका सरन को निर्देश

18 जून 1996: तत्कालीन द्रमुक सरकार ने कथित तौर पर बेहिसाब संपत्ति रखने के लिए जयललिता के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज करने के लिए डीवीएसी को निर्देश दिए।

4 जून 1997: चेन्नई आरोप पत्र दायर; 66.65 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति

21 अक्टूबर 1997: कोर्ट ने जयललिता, शशिकला, सुधाकरण और इलावर्सी के खिलाफ आरोप तय किए

मार्च 2002: मुख्यमंत्री के रूप में जयललिता ने संभाला कार्यभार

नवंबर 2002 से फरवरी 2003 तक करीब 76 गवाह अपने पिछले दिए बयानों से मुकर गए।

28 फरवरी, 2003: द्रमुक नेता अनबाझगन ने मामले को स्थानांतरण के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली

18 नवंबर 2003: सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश पर मामला बंगलौर की विशेष अदालत को सौंप दिया गया।

मार्च 2005 दिसम्बर 2003: स्पेशल कोर्ट ने मामले के लिए बंगलौर के बीवी आचार्य को पब्लिक प्रॉसीक्यूटर के तौर पर नामित किया।

22 जनवरी: सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुनवाई का रास्ता साफ कर दिया।

2010-2011 : गवाहों से फिर हुई पूछताछ

16 मई 2011: अन्नाद्रमुक के वापस सत्ता में आने पर जयललिता फिर से राज्य की मुख्यमंत्री बनीं।

20 अक्टूबर एवं 21, 22 और 23 नवंबर को जयललिता ने कोर्ट में पेश होकर सवालों के जवाब दिए।

13 अगस्त 2012: जी भवानी सिंह की स्पेशल पब्लिक प्रोसीक्यूटर के रूप में नियुक्ति की गई।

23 अगस्त 2012: द्रमुक नेता ने एसपीपी की नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए।

26 अगस्त: कर्नाटक सरकार ने एसपीपी को मामले से हटाया।

अगस्त-सितम्बर 2012: मामले से हटाए गए एसपीपी ने ली कोर्ट की शरण, दोबारा एसपीपी नियुक्त

30 सितंबर 2012: विशेष न्यायालय के न्यायाधीश बालकृष्ण सेवानिवृत्त हुए।

29 अक्टूबर 2012: च्च्च न्यायालय ने स्पेशल कोर्ट के जज के रूप में जॉन माइकल कुन्हा की नियुक्ति की।

28 अगस्त 2014: मामले में सुनवाई खत्म हुई। फैसले को सुरक्षित रखते हुए इसको घोषित करने के लिए 20 सितंबर की तारीख तय की गई।

15 सितंबर 2014: जयललिता ने सुरक्षा कारण बताकर स्थान परिवर्तन का अनुरोध किया।

16 सितंबर 2014: स्पेशल कोर्ट ने जयललिता की दलील स्वीकारते हुए स्थान में तबादला किया और फैसले की घोषणा के लिए 27 सितंबर तय की।

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