शिक्षकों का कार्य कक्षा में सिर्फ पुस्तकें पढ़ाना नहीं

शिक्षकों का कार्य कक्षा में सिर्फ पुस्तकें पढ़ाना नहीं

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शिक्षकों का कार्य कक्षा में सिर्फ पुस्तकें पढ़ाना नहीं है। बहुत सारे अध्यापक शिक्षण को महज अपनी नौकरी समझते हैं लेकिन ऐसे शिक्षकों की भी आज कमी नहीं है जो इसे एक मिशन मानकर चलते हैं। 
कल्पना कीजिए एक ऐसे शिक्षक की जो अपनी तनख्वाह से दूरबीन खरीदकर छात्र-छात्राओं को आसमान के चांद-सितारे दिखाकर प्रेरित करे। एक ऐसी प्रिंसिपल जो दूर-दराज के गांवों में विज्ञान शिक्षकों का इंतजाम करने का बीड़ा उठाए। एक ऐसे शिक्षक जिनका लक्ष्य कक्षा में पीछे की सीट पर बैठे बच्चों को आगे बढ़ाना हो।

शिक्षक दिवस के मौके पर शुक्रवार को राष्ट्रपति जिन साढ़े तीन सौ शिक्षकों को सम्मानित करने जा रहे हैं, उनमें शिक्षा को नए नजरिये से देखने वाले उपरोक्त तीन शिक्षक भी शामिल हैं। पहले बात करते हैं, उप्र के फरुखाबाद जिले की गल्र्स इंटर कालेज फतेहगढ़ की प्रिंसिपल मीना यादव की। इस छोटे से कस्बे में समस्या थी कि साइंस के शिक्षक कहां से लाएं। कोई सरकारी टीचर आने को तैयार नहीं। लड़कियां महंगे ट्यूशन पढ़ने को विवश। मीना ने आसपास के गांवों में एमएससी, बीएससी डिग्रीधारी लड़के-लड़कियों की तलाश की और उन्हें स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रेरित किया। अब सवाल, यह था कि उनके लिए वेतन कहां से आए। उन्होंने अभिभावकों को समझया कि ट्यूशन पर खर्च करने की बजाय स्वेच्छा से कुछ राशि इन नौजवानों को दें तो उनकी लड़कियों को ट्यूशन जाने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। योजना सफल रही। इस साल स्कूल में इंटर में साइंस पढ़ने वाली 98 में से 98 लड़कियां पास हुई।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के हरेक नगर में एएम इंस्टीटू्यशून दसवीं तक का सरकारी स्कूल है। इसे खोला सरकार ने है लेकिन इसे खड़ा किया है हेड शिक्षक मोहम्मद सलीम ने। पांच साल पहले जब वे यहां आए थे तो स्कूल की दुर्दशा थी। न बच्चे आते थे, न शिक्षक थे और न ही संसाधन। उन्होंने तब पल्ले से सवा दो लाख रुपये खर्च किए। आसपास के बच्चों को प्रेरित किया और आज वहां तीन हजार बच्चे हैं और 45 टीचर। स्थिति यह है कि निजी स्कूलों से लोग बच्चों का नाम कटवाकर यहां लाने लगे हैं। वे साइंस पढ़ाते हैं, हाल में उन्होंने अपनी जेब से 45 हजार रुपये में दूरबीन खरीदी है। इससे वे बच्चों को चांद-सितारे दिखाते हैं ताकि वे ऊंची उड़ान भरें। 

एक और नजीर, बिहार के आरा जिले के भोजपुर स्थित राजकीय यादव विद्यापीठ के भूगोल शिक्षक योगेन्द्र सिंह की नजर हमेशा पीछे सीटे पर बैठने वाले बच्चों पर रहते हैं। वे बच्चों को तीन श्रेणियों में रखते हैं, मेधावी, सामान्य एवं कमजोर। कमजोर बच्चे अक्सर पीछे बैठते हैं क्योंकि वे हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। देखा यह गया है कि कमजोर बच्चों को शिक्षक भी अक्सर दुत्कार देते हैं। लेकिन सिंह उन्हें आगे बढ़ाते हैं। वे पहले उनकी हीन भावना को निकालते हैं। उन्हें आगे बिठाते हैं। पढ़ाने के दौरान उनसे संवाद कायम करते हैं। उनमें आत्मविश्वास पैदा करते हैं। उनके प्रयासों से ऐसे बच्चों की दिशा ही बदल जाती है। ऐसे बच्चे सिर्फ भूगोल में ही नहीं अन्य विषयों में भी अपने को सुधार लेते हैं। सिंह के अनुसार आज इसी समावेशी शिक्षा की जरूरत है।

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