कैंसर से जीत चुके हैं जंग, अब पीड़ितों को दे रहे प्रेरणा

कैंसर से जीत चुके हैं जंग, अब पीड़ितों को दे रहे प्रेरणा

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जमशेदपुर. कैंसर से जंग जीतकर जमशेदपुर, बारीडीह की एक दंपती बीमारी से पीड़ितों को नई राह दिखा रही है। उन्हें बिंदास जिंदगी जीने और कैंसर से लड़ने की प्रेरणा दे रही है। सोमा सिन्हा और उनके पति उज्ज्वल सिन्हा ने कैंसर पीड़ित मरीजों और उनके परिवार काे नि:शुल्क काउंसलिंग करना ही जीवन का लक्ष्य बना लिया है। उज्ज्वल गला कैंसर से पीड़ित रह चुके हैं। नौ साल पहले सर्जरी हुई थी और तब से बोलने की क्षमता खो चुके हैं। वे बोल सकें, इसके लिए गले में मशीन लगाई गई है। इतना कुछ होने के बाद भी उज्ज्वल निराश नहीं हैं, बल्कि उनका हौसला देखा जा सकता है। जिंदगी जीने का अंदाज सीखा जा सकता है। कहते हैं-“ये जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। दुनिया में किसी न किसी रूप में सभी परेशान हैं। कोई बीमारी से परेशान, तो कोई किसी बहाने दुखी। दुखों से घबराना नहीं चाहिए। बल्कि, खुशियों का बहाना ढूंढना चाहिए।’ फिर गीत गुनगुनाते हैं-“सौ दिनों की जिंदगी से अच्छे हैं, प्यार के दो-चार पल।’

सही जानकारी नहीं रहने से होती है काफी परेशानी : सोमा सिन्हा

बकौल सोमा सिन्हा, 16 साल पहले पति को कैंसर होने की जानकारी मिली थी। तब मेरे सामने अंधेरा छा गया था। एक पल लगा जैसे मेरी दुनिया उजड़ गई। लेकिन, पति ने हौसला दिया। इसके बाद इलाज के लिए उन्हें कई स्थान पर ले गई। लेकिन, सही जानकारी नहीं होने के कारण हमें काफी परेशानी हुई। परेशानी को देखते हुए हमने साल 2005 के बाद काउंसलर बनने का निर्णय लिया। वाे इसलिए कि हमने जो सहा है या परेशानी झेली है, वह दूसरे को न हो। अगर मुझे भी किसी काउंसलर का साथ मिला होता, तो मैं अपनी बेटी का ख्याल अच्छी तरह से रख पाती। मुझे मलाल है कि मैं बेटी का ख्याल नहीं कर पाई।

पूर्व प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार की भी काउंसलिंग 

सिन्हा दंपती के अनुसार, सोमा ने टीएमएच मुंबई में काउंसलर का प्रशिक्षण लिया। वहां छह महीने तक काम किया। साल 2008 में जमशेदपुर लौटकर इंडियन कैंसर सोसायटी के सहयोग से पहली बार अवेयरनेस कैंप लगाया। यहीं से उन्होंने “आसार आलो मां सारदा कैंसर हेल्पलाइन’ की शुरुआत की। इस संस्था की आेर से कैंसर पीड़ितों व उनके परिवार को रोग, इलाज, कहां और कैसे कराएं इलाज, परिजनों के ठहरने आदि जानकारी दी जाती है। वे पीड़ितों के घर जाकर भी काउंसलिंग करते हैं। इसके अलावा सोमा महीना में दो दिन कोलकाता के ठाकुरपुर कैंसर अस्पताल में गेस्ट काउंसलर के रूप में रोगियों की काउंसलिंग करती हैं। वे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सलाहकार रणदीप घोष की भी काउंसलिंग कर चुकी हैं। वर्तमान में झारखंड सहित बिहार, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बांग्लादेश और मलेशिया के लगभग 400 कैंसर पीड़ितों काे नई राह दिखा रही हैं।

सोच बदलें मरीज, तो आधी समस्या यूं ही हो जाएगी दूर 

कैंसर की जानकारी होने पर मरीज और परिवार के सदस्यों को लगता है कि अब मौत हो गई। इस रोग के लिए यह सबसे खतरनाक स्थिति है।

क्या करें : सोच बदलें। ये जिंदगी दोबारा नहीं मिलेगी। भरोसा रखें कि बीमारी का इलाज संभव है।

कुछ मरीज दवा शुरू करते हैं और सुधार होने पर छोड़ देते हैं। जांच भी बंद करवा देते हैं।
क्या करें : उज्ज्वल सिन्हा इसलिए ठीक हुए, क्योंकि इलाज के साथ लगातार फालोअप जारी रखा। लिहाजा, फालाेअप जरूरी है। यानी, इलाज के साथ लगातार केयर लें कि स्थिति क्या है? रोग ठीक होने के लक्षण दिखने के बाद भी नियमित जांच करवाएं, क्योंकि कैंसर का अटैक कई बार कुछ समय बाद होता है।

लोगों में जागरूकता का अभाव 

क्या करें : रोग के प्रति जागरूकता की जरूरत है। स्कूल स्तर से शिक्षा देने की जरूरत हैं।

साल में एक बार करती हैं प्रोग्राम 

सोमा सिन्हा ने बताया कि वे साल में एक बार काउंसलिंग प्रोग्राम आयोजित करती हैं। इसमें देशभर के कैंसर विशेषज्ञों को बुलाती हैं। कैंसर पीड़ित और ठीक हो चुके मरीजों को शामिल किया जाता है। उन्होंने बताया कि उनकी संस्था ने गरीब परिवारों के कैंसर पीड़ित मरीजों के चार बच्चों को एडॉप्ट किया है। संस्था की ओर से इन बच्चों को प्लस टू तक की शिक्षा दी जाएगी। लेकिनए मदद की बात बच्चों से गुप्त रखी गई है। सहयोग सीधे रूप से परिवार को किया जाता है, ताकि बच्चों की भावना को ठेस न पहुंचे। इस महाभियान में सोमा को धमकी भी मिल चुकी है। साेमा के अनुसार, जब उन्होंने 2008 में काउंसलिंग का काम शुरू किया तो उन्हें चेतावनी दी गई कि यह काम डॉक्टरों का है आपका नहीं।

साभार: नवभारत टाइम्स

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