इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने डॉक्टरों से ऐंटिबायॉटिक न देने की अपील

इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने डॉक्टरों से ऐंटिबायॉटिक न देने की अपील

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इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने डॉक्टरों से जुकाम, बुखार या वायरल के मरीजों को एकदम से ऐंटिबायॉटिक देने से बचने की अपील की है। दरअसल देश में ये दवाएं धड़ल्ले से इस्तेमाल की जा रही हैं, जिससे आने वाले वक्त में बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव इन दवाइयों के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेंगे, जिससे ये ऐंटिबायॉटिक्स बेअसर हो जाएंगी। ऐसे में एक मामूली सा इन्फेक्शन भी जानलेवा बन जाएगा।
इस बड़े खतरे को देखते हुए अब भारत की भी नींद टूटी है। डॉक्टरों के स्वयंसेवी संगठन इंडियन मेडिकल असोसिएशन(IMA) रविवार से देशभर में एक अभियान छेड़ने जा रहा है। इस कैंपेन के तहत बताया जाएगा कि जिंदगी बचाने वाली ये दवाएं ज्यादा इस्तेमाल करने पर शरीर में ऐसे ऑर्गैनिजम बना सकती हैं, जिनपर दवाओं का कोई असर नहीं होता। आईएमए डॉक्टरों से भी कहेगी कि वे बुखार, जुकाम या सामान्य वायरल इन्फेक्शंस में तुरंत मरीजों को ऐंटिबायॉटिक न दें।

आईएमए के महासचिव डॉक्टर नरेंदर सैनी ने कहा, ‘पिछले 2 दशकों में किसी नई ऐंटिबायॉटिक की खोज नहीं हुई, जबकि बैक्टीरिया ने यह सीख लिया है कि उन्हें कैसे जिंदा रहना है। अगर हम ऐंटिबायॉटिक्स का ऐसे ही इस्तेमाल करते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जब साधारण से इन्फेक्शन भी जानलेवा बन जाएंगे।’ सैनी ने कहा कि आईएमए इसके लिए रविवार से भाषण, ट्रेनिंग और प्रेस के इस्तेमाल से ज्यादा से ज्यादा अवेयरनेस फैलाने की कोशिश करेगी।

आईएमए की देशभर मे 1,700 से ज्यादा शाखाएं हैं और करीब 2.5 लाख डॉक्टर इससे जुड़े हुए हैं। डॉक्टर्स भी आईएमए की इस पहल का स्वागत कर रहे हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि 1990 के बाद से कोई नया ऐंटिबायॉटिक ड्रग्स ग्रुप नहीं खोजा गया है। सर गंगा राम हॉस्पिटल की क्रिटिकल केयर मेडिसिन के वाइस चेयरमैन डॉक्टर सुमित राय कहते हैं, ‘बीमारी बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीव तेजी से विकसित हुए हैं, जबकि दवाएं इतनी तेजी से विकसित नहीं की जा रहीं। अगर हम मौजूदा ऐंटिबायॉटिक्स का इस्तेमाल कम नहीं करते हैं तो जल्द ही बुरे नतीजे देखने को मिलेंगे।’

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन समेत कई रिसर्चर्स के मुताबिक भारत में ऐंटिबायॉटिक ड्रग्स धड़ल्ले से यूज हो रहे हैं। लोगों को पता ही नहीं है कि इन्हें इस्तेमाल कैसे करना है। कुछ डॉक्टरों को भी इनके बारे में कम जानकारी है। यूरोप में इस सिलसिले में 2008 से ही अवेयरनेस प्रोग्राम चलाया जा रहा है। देर से ही सही, मगर भारत भी अब इस दिशा में जरूरी कदम उठा रहा है।

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