अभयानंद सीबीआई डायरेक्‍टर के सर्वाधिक उपयुक्‍त पात्र-रबिन्द्र नाथ तिवारी

अभयानंद सीबीआई डायरेक्‍टर के सर्वाधिक उपयुक्‍त पात्र-रबिन्द्र नाथ तिवारी

abhiyanand

भागलपुर। यदि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी को देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ प्रभावकारी अभियान छेड़ना है तो बिहार कैडर के आईपीएस अफसर व पूर्व डीजीपी अभयानंद को सीबीआई डायरेक्‍टर बनाना चाहिए। ऐसा मैं ही नहीं कह रहा। उनकी कार्यशैली से परिचित बिहार के हर आदमी का यही विचार है। बिहार के पुलिस महानिदेशक के रूप में उन्‍होंने भ्रष्‍टाचा‍री अफसरों के खिलाफ …जितनी कार्रवाई की, वे मील का पत्‍थर हैं। 1977 बैच के इस आइपीएस अफसर के पिता जगतानंद भी सूबे के डीजीपी रहे। जन्म लेने के बाद से ही जिसने सत्ता की गोद में खेली हो, और बड़ा होकर खुद सत्ताशाली बना हो, उस अभयानंद से मिलने जब अनपढ़ और गंवार आदमी भी जाता है, तो वह भी उसका मुरीद बन जाता है। बिल्कुल सहज। बौद्धिक प्रतिभाओं का धनी यह अधिकारी, उन अधिकारियों के लिए नजीर है, जो अपने पद के घमंड में चूर रहते हैं और आमलोगों से कटे रहते हैं। आइजी से लेकर डीजीपी तक मैंने उनकी गाड़ी के साथ कभी कोई एस्कॉर्ट वाहन चलते नहीं देखा।

मैं अभयानंद के कार्यशैली से तब से परिचित हूं जब वे हमारे गृह जिला साहिबगंज के एसपी हुआ करते थे। उन दिनों मैं स्‍कूली छात्र था। लेकिन वहां किए गए उनके काम छोटे से लेकर बड़ों के बीच चर्चा का विषय बने थे। अपराधियों की शरण स्‍थली साहिबगंज और कटिहार जिले के दियारा के बीहड़ में स्‍टीमर से गंगा पार कर पहुंचे पुलिस फोर्स के साथ अपराधियों का पीछा किया था। इस घटना को आज भी साहिबगंज के लोग याद करते हैं।

मिनी चंबल कहे जाने वाले इस दियारा में अभयानंद के पहले और बाद में कोई एसपी नहीं गया। आज भी उस दियारा में अपराधियों का अखंड साम्राज्‍य कायम है। अपराधी किसानों की फसल और मवेशी लूटते हैं। गंगा में मछुआरों और पत्‍थर व्‍यवसायी से रंगदारी वसूलते हैं। पुलिस को बड़ी राशि नजराने के तौर पर देते हैं। अभयानंद ने उस समय पत्‍थर
माफियाओं के खिलाफ भी कार्रवाई की थी। वे जनता की तकलीफ जानने के लिए सादे लिबास में शहर में घुमते थे। मैंने पत्रकार के रूप में उनकी कार्यशैली को तब देखा जब पटना स्‍टेट ब्‍यूरो रिपोर्टर के रूप में पुलिस मुख्‍यालय आता-जाता था। उन दिनों अभयानंद पुलिस मुख्‍यालय में अत्‍यंत ही महत्‍वहीन पद पर पदस्‍थापित थे। उनके जिम्‍मे कोई महत्‍वपूर्ण काम नहीं था। उस समय उनकी बौद्धिक प्रखरता निखर रही थी। सुपर थर्टी के लिए वे काम कर रहे थे। उनके कार्यालय में बैठकर मैं लंबी बातें करता था। उसमें सामाजिक, राजनीतिक मुद़दे शामिल रहते थे। लेकिन सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍टाचारी अफसरों पर कैसे लगाम लगे, इसपर चर्चा होती थी। पुलिस, अपराध और काली कमाई के खिलाफ कई धारदार रिपोर्ट लिखने में उनसे मुझे कई तथ्‍य मिले थे। उस दौरान राज्‍य के कई बड़े नौकरशाहों और नेताओं की काली कमाई पर मैंने कई रिपोर्ट लिखी। काली कमाई जब्‍त करने के नियमों की पड़ताल करती रिपोर्ट मैंने उस समय छापी थी जिसपर नीतीश सरकार में कार्रवाईयां हुईं। उस समय काले धन के खिलाफ अभ्‍ायानंद समय आने पर कार्रवाई करने की बात करते थे। व्‍यवस्‍था से क्षुब्‍ध अभयानंद को कई बार निराश होते भी देखा था। वे नौकरी से इस्‍तीफा देने की भी बात करते थे। लेकिन मैं कहता था कि एक समय आएगा जब आपके हाथ में बिहार पुलिस की बागडोर होगी।

बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। बूटा सिंह राज्‍यपाल बनकर आए। अभयानंद पटना रेंज के आईजी बनाए गए। आज किसी जिले में आम आदमी के लिए एसपी से भेंट करना एक कठिन काम है। लोग दौड़ लगाते रहते हैं लेकिन ज्‍यादातर डीएम, एसपी नहीं मिलते हैं। आईजी, डीआईजी की बात छोड दिजीए। बिहार की नौकरीशाही की यह त्रासदी है। लेकिन आईजी के रूप में अभयानंद से गांधी मैदान स्थित कार्यालय में लोग जब चाहे जाकर मिलते और परेशानी बताते थे। सैकडों लोग उनसे रोज मिलते थे। आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि उनके कार्यालय में जाने के लिए किसी को चिट्ठा नहीं देना पड़ता था। कार्यालय कक्ष के गेट पर सिर्फ एक सादे वेश में पुलिसकर्मी होता था। दूर दराज के गांवों का गरीब से गरीब और अनपढ़ से अनपढ़ सीधे उनके कार्यालय कक्ष में प्रवेश कर अपनी फरियाद सुनाता था। वे हर किसी की बात सुनकर संबंधित थाने और अधिकारी को फोन कर परेशानी का हल करवाते थे।

एडीजी स्‍पेशल ब्रांच के रूप में भी उन्‍होंने इस विभाग को उंचाई दी। मिली सूचना के आधार पर वे सीधे छापेमारी करवाते थे। कई बार छापेमारी में खुद भी गए। पटना के नजदीक के एक जिले में एसपी आवास के बगल में चल रहे जाली नोटों के कारोबार का छापेमारी कर उद़भेदन किया था। एडीजी मुख्‍यालय और डीजीपी के रूप में उन्‍होंने अपराधियों के खिलाफ स्‍पीडी टायल को गति दी। उनके प्रयासों से कई बड़े अपराधियों को सजा हुई। डीजीपी के रूप में उनका एक बड़ा काम है काली कमाई करने वालों पर छापेमारी और उनकी संपत्ति को जब्‍त करना। कई आईएसएस, आईपीएस अफसरों की संपत्ति को जब्‍त करवाया। घुसखोरी करके आलीशान अट़टालिका खडा करने वाले अफसरों के लिए अभयानंद आतंक थे। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि 2005 के बिहार विधानसभा के जिस चुनाव में अधिकारी केजे राव हीरो के रूप में उभरे, पर्दे के पीछे के हीरो अभयानंद ही थे। उनके फीड बैक पर केजे राव ने सारी कार्रवाई की और बिहार में एक ऐसे शासन का अंत हुआ जिससे सब लोग उब गए थे।
मिलने की बात तो छोड़ दीजिये, मोबाइल पर भी अधिकांश अफसर जनता के लिए उपलब्ध नहीं रहते हैं। ज्यादातर उन्ही की फोन सुनते हैं, जो उनकी पोस्टिंग को प्रभावित कर सकता हो। लेकिन अभयानंद डीजीपी रहते भी हर किसी के लिए मोबाइल पर उपलब्ध रहते थे। सुदूर गांव का आदमी भी उनसे रात में मोबाइल पर बात कर सकता था। तत्काल मोबाइल रिसीव नहीं कर पाने पर वह कॉल बैक करते थे। डीजीपी के रूप में हर रोज पुलिस मुख्यालय में पांच बजे शाम के बाद आम लोगों से मिलते थे। सबकी एक एक बात सुनकर सीधे थानाध्यक्षों को भी फोन करते थे। जनोन्मुखी पुलिसिया कार्यशैली का इससे बड़ा उदाहरण देश में दुर्लभ है।
मेरी राय मे अभयानंद ने जितना काम किया उसके लिए वे मेग्‍सेसे अवार्ड के हकदार हैं और सीबीआई डायरेक्‍टर के सर्वाधिक उपयुक्‍त उम्‍मीदवार। अभयानंद के पहले बिहार सरकार ने चर्चित आइपीएस अफसर देवकी नंदन गौतम को भी डीजीपी बनाया था। लेकिन वे उल्लेखनीय काम नहीं कर सके। मैं यहां यह भी बताना चाहता हूं कि अभयानंद के आलोचक यह कहकर उनकी आलोचना करते हैं कि उनका खास जाति के अफसरों के प्रति झुकाव रहता है, जिनपर कार्रवाई होनी चाहिये, उनपर नहीं हुई। वे यह भी कहते हैं कि उनके समय में अपराध के वैज्ञानिक अनुसंधान पर चर्चा तो हुई लेकिन अपराध और अपराधियों पर बहुत कंट्रोल नहीं हुआ।
मेरा इन सारी बातों को लिखने के पीछे अभयानंद के प्रति बहुत लगाव या दुराव जैसी बात नहीं है। न ही मैं उनका कोई व्‍यक्तिगत समर्थक हूं। न ही उनकी जात जमात का हूं। व्‍यापक लोकहित और देशहित में मैं उनके सीबीआई डायरेक्‍टर बनाए जाने का पक्षधर हूं। मेरे ये विचार पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि ईमानदारी की राह पर चलने देश के एक आम नागरिक के रूप में हैं।

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