अगर ये धर्म आड़े नही आता न तो तुम मेरी होती… सपना !

अगर ये धर्म आड़े नही आता न तो तुम मेरी होती… सपना !

धर्म जिसका मकसद लोगों को ईश्वर के बताये रास्ते पर चलना है। लेकिन यही धर्म तब समस्या उत्पन्न करने लगता है जब दो दिल अलग अलग धर्मो के हो।

ऐसी ही कहानी है राजस्थान के पुष्कर में जन्मे फैज़ और सपना का। फैज़ मुस्लिम और सपना हिन्दू। दोनों में ज़मीन आसमां का फर्क था। फैज़ सामान्य परिवार से था जबकि सपना का सामाजिक रूप से सुदृढ़ और खुशहाल था। फैज़ और सपना दोनों एक ही विषय में अपनी अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके थे। फैज़ सपना से दो साल आगे था। फैज़ को इस बात का कभी इल्म नहीं था कि कोई नज़र कॉलेज में उसका पीछा करती थी और उसे देख कर वो नज़र खुश हो जाया करती थी। लेकिन कॉलेज जीवन में फैज़ और सपना में कभी बात नहीं हुई। फैज़ ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन ऐसा आएगा जब उसे उन नज़रों का सामना करना होगा जो उसके लिए बेताब हुआ करती थी। फैज़ की पढ़ाई पूरी हो गई और उसने कॉलेज छोड़ दिया जबकि सपना उसी कॉलेज में पढ़ाई पूरी कर रही थी। सपना को फिर फैज़ कहीं नहीं दिखा कॉलेज में दुबारा।
6 साल बीत चुके थे। फैज़ छोटे मोटे काम करके अपना पेट पालने का तरीका सीख रहा था। परिवार में और भी कमाने वाले सदस्य भी थे उसके जिसकी वजह से फैज़ पर परिवार का बोझ कम था।
एक दिन फैज़ अजमेर जा रहा था हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पे उर्स के दौरान। रास्ते में वो एक दुकान के पास पानी पीने के लिए रुकता है। तभी पीछे से एक मधुर सी आवाज़ आई “भैया एक पानी की बोतल देना”…. फैज़ की निगाह अचानक पीछे की ओर देखने लगी और फैज़ को अपनी आँखों पे विश्वास नहीं हुआ कि ये वही सपना थी जो कभी उसके साथ कॉलेज में पढ़ा करती थी। लेकिन फैज़ सपना की भावनाओं से अवगत नहीं था।
“सपना तुम यहाँ अजमेर में कैसे?”
“क्यों मैं यहाँ नहीं हो सकती क्या?”
“मेरे कहने का मतलब ये है कि आज 6 साल बाद दिखी तुम। “
“हाँ, कितना वक्त बीत गया न”
फिर दोनों उसी दुकान के बाहर कुछ देर अपने अतीत में खो गए। कभी कॉलेज की सुनहरी यादों का ज़िक्र तो कभी शिक्षकों की बातें तो कभी भविष्य के बारे में चर्चा। फैज़ ने सपना से उसका फोन नम्बर ले लिया। और फिर कुछ पलों में दोनों एक दूसरे की नज़रों से ओझल हो गए।
अजमेर में ख्वाजा के दरबार में काफी भीड़ थी। किस्मत वालों को ही ख्वाजा अपने बारगाह में बुलाते हैं। फैज़ की किस्मत अच्छी थी कि वो ख्वाजा के दरबार में अपनी हाज़िरी लगाने आया था।
अजमेर से लौटने के बाद फैज़ अपने अंदर ऊर्जा का संचार महसूस कर रहा था। घर लौट कर उसने सपना को पहली बार फोन किया और धीरे धीरे बातें करने का सिलसिला चालु हो गया। कभी सपना का फोन आये तो कभी सन्देश। कुछ ही दिनों में फैज़ को सपना से अटूट लगाव हो गया। फैज़ समझ नहीं पा रहा था कि उसे हो क्या गया है। कुछ दिन बाद दोनों की मुलाकात कॉलेज में पूर्ववर्ती छात्रों के सम्मेलन के आयोजन के दौरान हुई।
कॉलेज के फंक्शन में सपना से मिलने के बाद फैज़ का मन कहीं नहीं लगने लगा। वो जान गया था कि उसे सपना से प्रेम हो गया है। सपना के दिल में तो अब भी फैज़ के लिए मोहब्बत के एहसास क़ैद थे मगर सपना उस एहसास को अपने दिल के कैदखाने से आज़ाद नहीं कर पा रही थी। न वो तब जुबां से इकरार कर सकी थी न अब इज़हार कर पा रही थी। एक दिन फैज़ से रहा नहीं गया उसने सपना से अपने प्यार का इज़हार कर दिया।
“सपना मैं कुछ कहना चाहता हूँ”
“कहो न”
“समझ नहीं आता कैसे कहूँ। मुझे तुमसे प्यार हो गया है। हर वक्त तुम ही तुम मेरे ख्यालों में छाई हो।”
सपना को भी प्यार था फैज़ से पर वो इस बात से नज़रें चुरा जाती थी मगर फैज़ के इज़हार से मुतास्सिर होकर सपना ने भी अपने दिल की बात को जुबां पे लाना बेहतर समझा। उसने 6 साल से अपने अंदर पल रहे जज़्बात को फैज़ के सामने पेश कर दिया:
“फैज़ मैं कॉलेज के दिनों से ही तुम्हे चाहती थी।”
“तो फिर कभी कहा क्यों नहीं”
“कैसे कहती? लड़की हूँ न। तुमने कभी महसूस नहीं किया?”
“मैं कैसे महसूस करता? मैं तो बस तुम्हे देखता था कि तुम अपने ही ख्यालों को दुनिया में खोई रहती हो अपनी सहेलियों के साथ। ऐसे भी तुम मुझसे दो साल जूनियर थी। लोग क्या कहते?”
“लोग तो कहते ही रहते हैं। लोग नहीं कहेंगे तो कौन कहेगा?”
“आई लव यू”
“आई लव यू टू”
दोनों के लब आपस में टकरा गए और कहीं दूर सागर में जलधाराएं हिलोर मारने लगी। पंछी आसमान में कलरव करने लगे। बागों में फूलों की खुशबू फ़िज़ा को मनमोहक बनाने लगी।
फैज़ इस बात को जानता था कि वो मुस्लिम है और सपना हिन्दू। ऐसे रिश्तों को समाज कभी कबूल नहीं करेगा और न सपना के परिवार वाले। मगर ये प्यार का शोला था जो भड़क उठा था। न इसपे फैज़ का नियंत्रण था न सपना खुद पे काबू कर पा रही थी।
फिर एक दिन फोन पर:
“सपना तुम मेरी हो न”
“हाँ फैज़ तुम्हारी ही हूँ। लेकिन तुम जानते हो न हम कभी एक नहीं हो पाएंगे।”
“क्यों नहीं?”
“मैं अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सकती। ये समाज मेरे परिवार को ताने मार मार का जीना दूभर कर देगा”
“किस समाज की बात कर रही हो?”
“उसी समाज की जिसमे हम तुम रहते हैं।”
फैज़ का मन करता था कि वो सपना को सबसे दूर भगा कर ले जाये और उसे अपना बना ले लेकिन फैज़ के संस्कार उसे कोई भी गलत कदम उठाने से रोक देते थे।
दूसरी तरफ सपना के दिल में फैज़ के लिए इतना प्यार था जिसे शब्दों में ब्यान कर पाना कठिन है। सपना भी चाहती थी कि फैज़ उसका हो जाये मगर परिवार का प्यार उसके प्यार पर भारी हो जाता था। और हो भी क्यों न। जिस परिवार में बच्चे पल कर बड़े होते हैं और संस्कार प्राप्त करते हैं वो क्यों अपने परिवार को ठोकर मारे। लेकिन सपना एक ऐसे दोराहे पर खड़ी थी जो कांटो भरा था। फैज़ को चुनती तो परिवार छूट जाये। और परिवार को चुनती तो फैज़।
आगे चल कर अगर दोनों बिछड़ जाएँ तो दोष किसका है? इनके अलग अलग धर्म का या इनके प्यार का? या उस समाज को दोष दें जिसने नियम कानून बनाये हैं? या हम अपनी सोच को दोष दें? चाहे जो भी दोषी हो मगर प्यार का मीठा अहसास फैज़ और सपना के दिल में सदैव बना रहेगा। साथ बिताये लम्हों की कसक तो हमेशा ही साथ होगी फैज़ और सपना के।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई। हम आधुनिक युग 2016 में जी रहे हैं फिर भी हमारे समाज की सोच आज भी बेड़ियों में जकड़ी हुई है। आज भी समाज दो प्यार करने वालों को एक नहीं होने देता। और अगर प्यार करने वाले अलग धर्मों के हो तो कहना ही क्या। आज भी हमारे समाज में प्यार से ज़्यादा जाति-धर्म और गोत्र को ही महत्व दिया जाता है। राजनेताओं के लिए बस धर्म का इस्तेमाल वोट पाने के लिए किया जाता है। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई आपस में हैं भाई भाई केवल एक नारा मात्र है और कुछ नहीं। भले ही कुछ लोग ये कहें कि सभी धर्मों का सार एक ही है। लेकिन समाज के इस सच का आइना कुछ और ही है जहाँ फैज़ और सपना जैसे कई अनगिनत इश्क के शैदाई आज भी अपने हाल पर आंसू बहा रहे हैं………..
अगर कहानी अच्छी लगी हो तो अवश्य बताएं।
आपके विचारों का स्वागत है।
शहबाज़ खान

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