मुसलमान क्यों मनाते हैं नौरोज

मुसलमान क्यों मनाते हैं नौरोज

मुसलमान नए साल के तौर पर #नौरोज इसलिए मनाते हैं कि इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना तो वैसे मोहर्रम है, लेकिन इस महीने में मोहम्मद-ए-मस्तफा (स.व.स.) के नाती हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) को कर्बला में परिवार व दोस्तों के साथ तीन दिन के प्यासे को शहीद कर दिया गया था। वह मोहर्रम के महीने की 10 तारीख थी। इस कारण मुसलमानों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया और मोहर्रम का महीना गम और दुख का पर्यायवाची बन गया।

वैसे मोहर्रम का महीना जोकि एहतिराम और इबादत का महीना माना जाता था, इसलिए यह महीना इबादत के साथ-साथ गम के महीने की भी पहचान बन गया।

मुसलमान नए साल के रूप में नौरोज को मनाने लगे, वह भी ईद की सूरत में। नौरोज मनाना भी इसलिए जरूर था, क्योंकि इस दिन इस्लाम में कुछ खास ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी हैं..इस रोज यानी 21 मार्च 656 ई. को रसूल (स.व.स.) ने अली (अ.स.) को अपना जानशीन बनाया था।

इस दिन हजरत अली की नज्र दिलवाते हैं, नए पकवान बनाकर नए कपड़े पहते हें और ईद की तरह ही लोगों को मुबारकबाद देकर गले मिलते हैं। शिया मुसलमानों का मानना है कि इसी दिन हजरत अली (अ.स.) ने रसूल (अ.स.) साथ काबे से बुत हटाए थे। शिया मुसलमान में इस नए साल को मनाने को बढ़वा इसलिए भी दिया गया कि वे नए साल के नाम 31 दिसंबर की रात को होने वाली बुरी बातों व गुनाह से बचें और नए साल का मौका इस्लामी तरीके से मनाएं।

नौरोज परशियन कैलेंडर का पहला दिन है, जिसे जोरोस्टियन व ईरानी नया दिन या पहला दिन के रूप में मनाते हैं। जोरोस्टियन ही ईरानियों के पूर्वज है जो आग की पूजा करते हैं। नौरोज नए दिन के रूप में कई देशों में मनाया जाता है, जैसे मुख्य रूप से ईरान, इराक, अफगनिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, भारत और पाकिस्तान में भी इन देशों में रहने वाले भी सभी नहीं, फिर भी कई वर्गो के लोग मनाते हैं, जैसे कश्मीरी पंडित, बहाई, शिया मुसलमान व इस्माइली मुसलमान आदि नौरोज को ईद के रूप में मनाते हैं। इसके और भी कई कारण हैं। हर धर्म व हर वर्ग के पास अलग-अलग कारण हैं।

वैसे तो 21 मार्च वजूद में ईस्वी के बाद ही आया, लेकिन इस त्योहार का इतिहास ईसा से लगभग 3 हजार साल पहले से माना जाता है, जिसके सुबूत भी मिलते हैं, लेकिन नौरोज शब्द के साथ पहली बार इस त्यौहार की पहचान ईसी से 2 सदी पहले ही हुई।

इतिहास के अनुसार, नबी व पैगंबर आते गए और अपनी-अपनी वजहों के आधार पर उस समय के लोग इस प्रकार का त्योहार मनाते रहे। तीन हजार साल पहले तो 21 मार्च था ही नहीं, ये त्योहार बदलते वसंत त्रतु के कारण मनाया जाता था, मौसम बदलने से बीमारियां शुरू हो जाती हैं। इसी कारण फूलों के रंगों से व फलों से निकले खुशबू, रस एक-दूसरे पर डालकर नौरोज मनाया जाता था, ताकि लोग उन फूलों में पाई जाने वाली दवाइयों के कारण लोग बीमार होने से बचें।

जोरोस्टियन ईरान से भारत की ओर कूच कर गए और यहां आकर आर्यन कहलाए और अपनी इसी संस्कृति को यहां भी आम किया, लेकिन वह भारत में होने वाले मौसम व फसलों के आधार पर यहां फूलों के रंगों से खेलने लगे, बाद में मंहगाई के कारण इन रंगों की जगह रासायनिक रंगों ने ले लिया, फिर लोग नौरोज में भी इन्हीं रंगों से खेलने लगे, जो लोगों की सेहत के लिए नुकसान दे सिद्ध हो रहा है।

जहां तक तीन हजार वर्ष पहले 21 मार्च का प्रश्न है, तो इस दिन रात-दिन बराबर होते हैं, जोकि तब से चला आ रहा है, जब दुनिया बनी। इसलिए 21 मार्च की तारीख के वजूद में आने से पहले जो भी खुशी की घटनाएं घटीं, वे रात-दिन बराबर होने वाले दिन, उन घटनाओं को 21 मार्च के दिन आज भी मनाया जाता है।

यह भी कहा जाता है कि इसी दिन दुनिया वजूद में आई, इसी दिन नबी हजरत नूह की किश्ती साहिल पर पहुंची, इसी दिन हजरत यूसुफ के जिंदा होने का पता चला, इसीदिन हजरत युनूस 40 दिन मछली के पेट में रहने के बाद जिंदा निकले, इसी दिन इब्राहिम को नमरूद की आग से निजात मिली, इसी दिन लोगों ने खुदा को एक मानकर सजदा किया और इसी दिन कौमें बनीं।

इस्राइल के 70 हजार लोग एक बीमारी की वजह से मर गए, नबी ने उन मुर्दो की हड्डियों पर खुदा के हुकूम से नबी ने पानी का छीटा मारा तो वह सब मुर्दे जिंदा हो गए। कहा जाता है, तभी से नौरोज के दिन एक दूसरे पर इत्र-खुश्बू छिड़का जाती है, हजरत इब्राहिम ने भी इसीदिन काबे में रखे बुतों को हटाकर काबे का फिर से निर्माण शुरू किया गया था।

फिर जब तारीख 21 मार्च वजूद में आई तो इसके बाद इसी दिन रसूल (अ.स) ने हजरत अली को अपने कंधे पर बैठाकर काबे को बूतों से साफ करवाया था, इसी दिन हजरत अली ने मुस्लमानों को हाथों पर बैअत करने का आदेश दिया था, इसी दिन जंगे-नहरवान फतह की गई।

ये भी रिवायतें हैं कि रसूल (अ.स.) का जन्म 570 ई. में इसी तारीख को हुआ और तय हुआ कि कूफे के कनासा मोहल्ले में दज्जाल को इसी दिन इमाम मेंहदी के हाथों सूली पर चढ़ाया जाएगा। बहरहाल इसके बाद भी कई रिवायतें इमामों से जुड़ी हैं कि इसी दिन खुशी क्यों मनाना चाहिए। यह 21 मार्च की बात नहीं, यह दिन-रात बराबर होने की वजह है।

21 मार्च के दिन की कई हदीसे-रिवायतें व कुरआन में भी इसी दिन खुशी मनाने का हूकुम है, क्योंकि इसी दिन पूरी दुनिया की शुरुआत हुई। हवाएं चलीं, सूरज निकला, पेड़-पौधे जमीन पर उगे।

2 अक्टूबर, 2009 को संयुक्त राष्ट्र की दुबई में एक बैठक हुई, जहां नौरोज को त्योहारों में शामिल किया गया। इसके बाद 2010 में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेम्बली ने इंटरनेशनल डे ऑफ नौरोज (वसंत ऋतु पर पारसियों का त्योहार) घोषित कर छुट्टी का ऐलान भी कर दिया गया।

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