अंगभूमि और दीपावली: 2 “यहाँ विराजमान हैं कुबेर व गणपति”

अंगभूमि और दीपावली: 2 “यहाँ विराजमान हैं कुबेर व गणपति”

अंगभूमि और दीपावलः2 "यहाँ विराजमान हैं कुबेर व गणपति"दीपावली के अवसर पर #भगवान् शंकर के मित्र और लंकापति रावण के भ्राता कहलाने वाले धन के देवता #कुबेर व सिद्धि विनायक-विघ्नहर्ता #गणपति की अत्यंत महत्ता है।

जहाँ कार्तिक माह की कृष्ण त्रयोदशी को ‘धनतेरस’ के दिन धनाध्यक्ष कुबेर की आराधना की जाती है, वहीं #दीपावली के अवसर पर घर-घर में गणेश पूजन होता है। श्री व समृद्धि दात्री महालक्ष्मी ईष्ट तो हैं ही।

दीप-पर्व में कुबेर व गणेश के विशेष महात्म्य के कारण प्रचीन काल में अंग देश के नाम से विख्यात भागलपुर जिला के कहलगाँव अनुमंडल के अंतीचक ग्राम में स्थित विक्रमशिला बौद्ध विहार के भग्नावशेषों की खुदाई से प्राप्त कुबेर, जिन्हें बौद्ध मान्यता के अनुसार ‘जम्भल’के नाम से सम्बोधित किया जाता है तथा भगवान् गणेश की मूर्तियों की चर्चा प्रासांगिक हो उठती है।

आठवीं शतिब्दी के उत्तरार्ध में पाल-वंश के राजा धर्मपाल द्वारा स्थापित विक्रमशिला बौद्ध महाविहार का न सिर्फ ज्ञान-विज्ञान, अपितु कला व संस्कृति के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण स्थान रहा। यद्यपि यह एक बौद्ध शिक्षा का केन्द्र था और यहाँ विशेष रुप से तंत्रयान एवं वज्रयान का पठन-पाठन होता था, किंतु समन्ववादी दृष्टिकोण अपनाते हुए यहां ब्राह्मण विषयों का भी समावेश था। यही कारण है कि विक्रमशिला के उत्खनन से प्राप्त असंख्य मूर्तियों में न सिर्फ बौद्ध धर्म से संबंधित, वरन् ब्राह्मण धर्म व विभिन्न मत-मतांतरों से संबद्ध मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं जो काले कसौटी पत्थर, स्लेटी पत्थर, लाईम स्टोन, सफेद बलुआ पत्थर और धातुओं (खासकर कांसे से निर्मित) तथा मृण-मूर्ति फलक (टेराकोटा प्लैक्स) पर कलात्मक ढंग से अंकित हैं।

महाविहार के मोनास्टिक सेल्स के उत्खनन के क्रम में मिली जम्भल (कुबेर) की मूर्ति अद्वितीय है। बौद्ध धर्म में धन के देवता कुबेर को जम्भल कहा गया है। इसकी विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए अपनी पुस्तक ‘विक्रमशिला’ में लाल बाबू सिंह कहते हैं कि जम्भल की यह प्रतिमा मुकुटधारी, माला पहने है तथा कमर व बांह के आभूषणों से सुसज्जित है। नृत्य की स्थिति में त्रिभंग मुद्रा वाली इस मूर्ति के दाहिने हाथ में (धन की) पोटली है और इसका बायां हाथ टूटी हुई अवस्था में है।

शैलीगत दृष्ट से यह मूर्ति आठवीं-नवीं सदी की मानी गयी है। इसी तरह महाविहार के मुख्य मंदिर की निचली दीवारों में लगे मृणमूर्ति फलक पर भी जम्भल की एक मूर्ति उत्कीर्ण है जो अर्धपर्यकासन पर बैठे दिखाये गये हैं, जिनके पास में ही नीचे बैठे एक छोटे व पूंछदार  पशु का मनोहारी चित्र अंकित है।
विक्रमशिला की खुदाई से गणेश की भी प्रतिमा प्राप्त हुई है जो अपने शैलीगत कारणों से विशिष्ट है तथा विविध आयुधों से युक्त है जिसका वर्णन करते हुए लाल बाबू सिंह कहते हैं, ‘आयुधों का क्रम इस प्रकार हैः नीचे दायें हाथ में अक्षमाला अर्थात रुद्राक्ष, उपर खड़ग्, परशू, और बायें हाथ में नीचे मोदक (लड्डू) और उपरी हाथ का आयुध टूटा हुआ है। केश-कला जटामुकुट शैली में है। मूर्ति के पीछे उड़ते हुए गंधर्वों को और गणेश के पैरों के पास मुषिक वाहन को बैठे दर्शाया गया है।

शैलीगत विशेषताओं के आधार पर यह मूर्ति दशवीं सदी की मानी गयी है। इसके अतिरिक्त बौंसी (बांका) के मंदार पर्वत से भी गणेश की विशिष्ट मूर्तियां पाई गई हैं जिनमें से दो भागलपुर संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। भागलपुर के सुलतानगंज की अजगैबी पहाड़ी पर भी भगवान् शिव व माता पार्वती के साथ गणपति की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। – शिव शंकर सिंह पारिजात

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