मप्र : विकास पर भारी 8 लाख बाल श्रमिक

मप्र : विकास पर भारी 8 लाख बाल श्रमिक

child-labourभोपाल, 12 जून,  मध्य प्रदेश सरकार राज्य के विकास का ढिढोरा पीटती है, मगर राज्य में आठ लाख से ज्यादा बाल मजदूर (पांच से 14 वर्ष) सरकार के इस दावे को आईना दिखाते हैं। बाल श्रमिकों की यह अबादी राज्य में कुल बच्चों की आबादी का लगभग पांच प्रतिशत है।

राज्य के श्रममंत्री अतर सिंह आर्य ने फरवरी और मार्च, 2016 में विधानसभा के बजट सत्र में एक प्रश्न के जबाव में कहा था कि 2013 से अक्टूवर 2015 तक राज्य में 109 बाल श्रमिकों की पहचान की गई और उन्हें मुक्त कराया गया एवं उनसे अवैध रूप से श्रम कराने वालों पर प्रकरण दर्ज किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि 226 बाल श्रम के प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किए गए हैं।

राज्य में बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी (सीआरओ) का कहना है कि मंत्री द्वारा विधानसभा में दिए गए बयान के विपरीत 2011 की जनगणना के आकड़े कुछ और ही सच बयान करते हैं।

संस्था ने कहा है, “प्रदेश में 1,6830,956 बच्चे हैं, उनमें सें 8,06,546 बच्चे (पांच-14 वर्ष) कामगार हैं। इन कामगार बच्चों में 53.49 प्रतिशत लड़के हैं, और 46.51 प्रतिशत लड़कियां हैं। कुल कामगार बच्चों में से 87.9 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण क्षेत्र से हैं, जबकि 12.1 प्रतिशत कामगार बच्चे शहरी क्षेत्र से हैं।”

सीआरओ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम विरोध दिवस (12 जून) पर जारी विश्लेषण के अनुसार, “आदिवासी बहुल जिले अलीराजपुर में सर्वाधिक 14.8 प्रतिशत कामगार बच्चे (पांच-14 वर्ष) हैं, जबकि झाबुआ जिले में 14.36 प्रतिशत कामगार बच्चे हैं। प्रदेश के अन्य आदिवासी बहुल जिले बड़वानी, बैतूल और डिंडोरी में क्रमश: 9.2, 8.2 और 8.7 प्रतिशत कामगार बच्चे हैं। भिण्ड जिले में सबसे कम दो प्रतिशत कामगार बच्चे हैं। कामगार बच्चों के मामले में मध्य प्रदेश देश में पांचवें स्थान पर है।”

संस्था ने कामगार की तीन प्रमुख श्रेणियां बनाई है। एक सीमांत कामगार, यानी साल में छह माह या इससे कम समय के लिए मजदूरी करने वाले (सीमान्त में भी दो श्रेणियां हैं पहली शून्य से तीन माह काम करने वाले कामगार, दूसरे तीन से छह माह तक काम करने वाले कामगार) और दूसरी मुख्य कामगार की श्रेणी, यानी वर्ष में छह माह या उससे अधिक काम करने वाले। तीसरी श्रेणी में वे हैं, जो काम के लिए हमेशा उपलब्ध हैं।

सीआरओ के निदेशक रघुराज सिंह ने राज्य सरकार से सवाल किया है कि क्या इन बच्चों को वे अधिकार हासिल हो पा रहे हैं, जिसका जिक्र अंतर्राष्ट्रीय बाल अधिकार घोषणा पत्र 1989 में है।

उन्होंने आगे कहा, “बचपन में मजदूरी को मजबूर बच्चों के सिर्फ अधिकार छीनने की बात नहीं है, बल्कि उनका बचपन ही छिन रहा है। राज्य के पांच से नौ वर्ष तक के 148,326 और नौ से 14 वर्ष के 658,220 बच्चे मजदूरी को मजबूर हैं।”

राज्य विकास की नई-नई परिभाषाएं गढ़ने का दावा करता है, मगर यहां के सामाजिक संकेतांक नकारात्मक हैं, जैसे बाल मजदूरी, मातृ मृत्युदर, बाल मृत्यु दर, स्कूल छोड़ने की दर, किसानों की आत्महत्या की घटनाएं।

सीआरओ के अनुसार, बच्चों में कुपोषण, खून की कमी या शारीरिक एवं मानसिक विकास के अवरुद्ध होने के हालात चिंताजनक हैं। महिलाओं में खून की कमी, उनके विरुद्ध अपराध के मामले, इन सभी संकेतकों में राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश निचले पायदान पर है, यानी ये सभी संकेतांक नकारात्मक हैं।

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