प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लड़कियों की शिक्षा को बताया प्राथमिकता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लड़कियों की शिक्षा को बताया प्राथमिकता

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शिक्षक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को देशभर के स्कूली बच्चों के साथ संवाद किया और कहा कि लड़कियों की शिक्षा उनकी शीर्ष प्राथमिकता है। उन्होंने सभी स्कूलों में शौचालय सुनिश्चित करने की पहल को इसी प्रयास का हिस्सा बताया।

छात्रों को संबोधित करते हुए और वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए उनके सवालों के जवाब देते हुए मोदी ने कहा कि वह इस बारे में राज्यों से बात कर रहे हैं कि स्कूलों की स्थापना लड़कियों के घरों के आसपास ही की जाए ताकि वह पढ़ाई बीच में ही न छोड़ें।

प्रधानमंत्री ने शिक्षा के पेशे के महत्व को बढ़ाने पर जोर दिया और सुझाव दिया कि सभी पढ़े लिखे लोगों को, जिनमें इंजीनियर, वकील, आईएएस अधिकारी, आईपीएस अधिकारी और डॉक्टर शामिल हैं, कक्षाएं लेनी चाहिएं ताकि शिक्षण को राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी एक जन आंदोलन बनाया जा सके।

मोदी ने कहा कि आप मुझे बताइए कि यदि हिंदुस्तान में पड़े लिखे लोग सप्ताह में एक पीरियड, कितने ही बड़े अफसर क्यों न बने हों, वो जाकर बच्चों के साथ बिताएं, उनको कुछ सिखाएं, आप मुझे बताइए कि शिक्षा में यदि शिकायत है कि अच्छे टीचर नहीं है, इसको ठीक किया जा सकता है कि नहीं किया जा सकता है। हम राष्ट्र निर्माण को एक जन आंदोलन में परिवर्तित करें, हर किसी की शक्ति को जोड़े, हम ऐसा देश नहीं हैं जिसको इतने पीछे रहने की जरूरत है, हम बहुत आगे जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि देश शिक्षकों की कमी से जूझ रहा है और इसे बदलना होगा, ताकि भारत शिक्षकों का निर्यात कर सके। लड़कियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए मोदी ने कहा कि उन्हें शिक्षित करने का मतलब है दो परिवारों को शिक्षित करना। एक अपने मायके को और दूसरा ससुराल को। मोदी ने बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति पर खेद प्रकट किया।

उन्होंने कहा कि लड़कियों की शिक्षा मेरी प्राथमिकता है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए अपने भाषण की चर्चा करते हुए मोदी ने कहा कि प्रत्येक स्कूल में शौचालय का निर्माण भी लड़कियों को पढ़ाई बीच में ही छोड़ने से रोकने के प्रयास का हिस्सा है।

मोदी ने कहा कि मैंने 15 अगस्त को एक बात कही थी कि हमारे देश में जितने स्कूल है, उनमें कोई ऐसा न हो, जहां बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय न हो। आज कई स्कूल हैं, जहां पर बालिकाओं के लिए शौचालय नहीं है।

उन्होंने कहा कि आपको यूं लगेगा कि क्या यह ऐसा कोई काम है, जो प्रधानमंत्री देखें, लेकिन जब मैं विस्तार में गया तो मुझे लगा कि यह बड़ा महत्वपूर्ण काम है, करने जैसा काम है, लेकिन उसमें देशभर के टीचर जो मुक्षे सुन रहे हैं, मुझे हर स्कूल से मदद चाहिए।

इस संदर्भ में उन्होंने हाल की अपनी जापान यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि वहां लोगों ने मुझे बताया कि जापान में सभी शिक्षक और छात्र मिलकर स्कूल में सफाई करते हैं, यहां तक कि शौचालय भी मिलकर साफ करते हैं। वहां के लोगों ने बताया कि यह जापान के स्कूलों में चरित्र निर्माण का एक हिस्सा है और वहां के लोगों ने मुझसे सवाल किया कि हिंदुस्तान में ऐसा क्यों नहीं कर सकते।

छात्रों और शिक्षकों के साथ खुलकर बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री ने शिक्षण पेशा, चरित्र निर्माण, स्वच्छता और कौशल विकास के लिए सम्मान पैदा करने पर जोर दिया।

उन्होंने छात्रों से कहा कि वह अपने सपने पूरे करने के लिए मेहनत करें और कहा कि शिक्षकों को अपने छात्रों में उनकी योग्यता के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए और उनके साथ ठीक वैसा ही एक समान बर्ताव करना चाहिए जैसे मां अपने सभी बच्चों के साथ करती है।

मोदी ने अध्यापकों से नयी टैक्नोलॉजी से लैस होने का आग्रह करते हुए कहा कि इसके लिए अगर उन्हें सीखना पड़े तो वह सीखें। उन्होंने कहा कि भले ही हमारी आयु 40.45.50 की हो गई हो, मगर हम सीखें। हम जिन बालकों के साथ जी रहे हैं, जो कि आज की टेक्नोलॉजी के युग में पल रहा है, बढ़ रहा है, उसे उससे वंचित न रखें। अगर हम उसे वंचित रखेंगे तो यह बहुत बड़ा सामाजिक अपराध होगा।

उन्होंने कहा कि आवश्यक है कि हम इस बात को उजागर करें कि समाज के जीवन में शिक्षक का महत्व क्या है और जब तक हम उस महात्म्य को स्वीकार नहीं करेंगे, न शिक्षक के प्रति गौरव पैदा होगा और न शिक्षक के माध्यम से नयी पीढ़ी में परिवर्तन में कोई ज्यादा सफलता मिलेगी।

मोदी ने अध्यापन को समयानुकूल परिवर्तन करने पर जोर देते हुए कहा कि इस बात पर सोचना होगा कि इसे कैसे अधिक प्राणवान और तेजस्वी बनाया जाए। एक बच्चों द्वारा यह पूछे जाने पर कि यदि वह अध्यापक होते तो कैसे होते, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि टीचर का काम है अच्छाइयों को देखना और उन्हें तराशकर उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाना।

इस संदर्भ में उन्होंने चीन की एक कहावत का जिक्र करते हुए कहा, चीन में एक कहावत है कि जो लोग साल का सोचते हैं, अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं, वो फलों के वक्ष बोते हैं, लेकिन जो पीढ़ियों का सोचते हैं, वो इंसान बोते हैं। मतलब उसको शिक्षित करना, संस्कारित करना और उसके जीवन को तैयार करना।

बच्चों से जापान का अनुसरण करने के लिए कहते हुए मोदी ने अपनी हाल की जापान यात्रा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह सीखने पर जोर देते हैं। वह अपने बच्चों से समान व्यवहार करते हैं। प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल अधिकतम किया जाता है और वैज्ञानिक सोच, अनुशासन, सफाई के साथ विकास पर जोर के साथ ही बच्चों में सबके लिए सम्मान की भावना होती है।

इस दौरान मणिपुर के एक बच्चों ने प्रधानमंत्री से पूछा कि वह प्रधानमंत्री कैसे बन सकता है तो प्रधानमंत्री ने मुस्कुराते हुए मश्वरा दिया कि वह 2024 का चुनाव लड़ने की तैयारी करे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में किसी के लिए भी ऐसा करना संभव है।

उन्होंने कहा कि वह राजनीति को एक पेशा नहीं बल्कि सेवा मानते हैं। उन्होंने कहा कि किसी को लाभ के लिए कोई काम नहीं करना चाहिए। मोदी ने कहा कि लाभ मिलता होता तो मैं नहीं आता क्योंकि वह ज्यादा मुसीबत में रहते हैं, जो लाभ के लिए आते हैं, जो लाभ के लिए नहीं आते वह ज्यादा आनंद में रहते हैं।

प्रधानमंत्री ने रोजगारपरक शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो सिर्फ डिग्री नहीं बल्कि उसके साथ नौकरी भी दिला सके। उन्होंने कहा कि डिग्री के साथ हुनर भी होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि जो लोग उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते हैं, उनके लिए रोजगारपरक शिक्षा पाना और भी जरूरी है, जिससे कि वह काम करने लायक कोई न कोई हुनर सीख सकें।

प्रधानमंत्री ने कहा कि हुनर की शिक्षा हर क्षेत्र की आवश्यकता के अनुरूप दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर किसी क्षेत्र में उद्योग ज्यादा हैं तो वहां के लोगों को उसके अनुरूप हुनर सिखाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जरूरत के हिसाब से अगर हम हुनर की शिक्षा को बढ़ावा देंगे तो यह देश के विकास में बहुत बड़ा योगदान होगा।

प्रधानमंत्री ने बच्चों से संवाद करते हुए इस बात का खुलासा किया कि बचपन में वह भी शरारतें किया करते थे और उनका मानना है कि शरारत के बिना बचपन बेमानी है।

बातचीत के दौरान एक बच्चे द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या बचपन में उन्होंने भी शरारत की है, मोदी ने कहा कि मैं भी शरारत करता था। बताता हूं कैसे शरारत करता था। शादी के अवसर पर जो शहनाई बजाते, हम कुछ दोस्त मिलकर उन्हें इमली दिखाकर छेड़ा करते थे।

उन्होंने अपनी बचपन की यादों को कुरेदते हुए बड़े शरारती अंदाज में बच्चों से कहा कि आप लोग जानते हैं, इमली दिखाने से क्या होता है। इस दौरान मोदी के चेहरे पर बालसुलभ मासूमियत उभर आई और उन्होंने कहा कि इमली दिखाने से मुंह में पानी आ जाता है और पानी आने पर वह शहनाई वाले शहनाई नहीं बजा पाते थे और हमें मारने के लिए दौड़ते थे।

अपनी इस शरारत को बताने के साथ ही उन्होंने बच्चों से यह वादा भी लिया कि वह शहनाई वालों को इस तरह से तंग नहीं करेंगे। बचपन की शरारतों को प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा कि कोई बालक ऐसा कैसे हो सकता है कि वह शरारती न हो। बालक में मस्ती और शरारत होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि इन दिनों बहुत तेजी से बच्चों का बचपना मर रहा है। उन्होंने स्कूली दिनों में ही बच्चों पर पढ़ाई का अत्यधिक बोक्ष बढ़ जाने की पष्ठभूमि में कहा कि आजकल के बालक समय से पहले ही अलग से सोचने लगते हैं, लेकिन बालक का बचपना दीर्घकालीन होना चाहिए, उसमें पूरी मस्ती और शरारत होनी चाहिए।

बच्चों को पढ़ाई के साथ खेलकूद में भी हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करते हुए मोदी ने यहां मानिकशॉ आडिटोरियम में एकत्र देश के विभिन्न राज्यों के स्कूलों से आए बच्चों से पूछा, कितने बालक दिन में चार बार पसीना बहाते हैं।

उन्होंने कहा कि जीवन में खेलकूद नहीं तो वह बहुत नीरस हो जाता है, इसीलिए बच्चों को चाहिए कि वह इतना खेलें कि दिन में चार बार पसीना बहे।

उन्होंने कहा कि आजकल बच्चों टेलीविजन और कंप्यूटर से ज्यादा जुड़ गए हैं और इसीलिए उनमें खेलकूद और बचपन की मस्ती कम हो गई है।

खेलकूद के साथ ही उन्होंने बच्चों को किताबें पढ़ने की आदत के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि वे हर तरह की किताबें पढ़ें। उन्होंने कहा कि वह लोगों के जीवन चरित्र से जुड़ी किताबें जरूर पढ़ें। ये जीवन चरित्र चाहे खेल से जुड़े हो, सिनेमा से, व्यापार जगत से या विज्ञान जगत से, जिसमें भी रुचि हो बच्चों को उसे पढ़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन चरित्र संबंधी किताबें पढ़ने से न सिर्फ प्रेरणा मिलती है, बल्कि उससे इतिहास के बहुत करीब पहुंचा जाता है और सीखने को काफी कुछ मिलता है। बात ही बात में उन्होंने चुटकी ली कि यहां आए सभी बच्चों से उनके टीचरों ने कहा होगा कि ये मत करना, वो मत करना और ऐसे बैठना, वैसे बैठना इसीलिए आप सब ऐसे चौकस बैठे होंगे, लेकिन मैं तो कहूंगा, हंसते खेलते रहिए और हंसते खेलते बात कीजिए।

बच्चों द्वारा किए गए सवालों पर उन्होंने कहा कि बहुत सारे सवाल किए गए, लेकिन जाने क्यों मन में यह सवाल पैदा हो रहा है कि भीतर का बालक मर तो नहीं गया। इस टिप्पणी के जरिए शायद प्रधानमंत्री का इशारा इस ओर था कि बच्चों ने उनसे सीधे संवाद करने की बजाय रटे रटाए सवाल पूछे।

बच्चों से संवाद के अंत में उन्होंने कहा कि हंसते खेलते रहिए, यही बालक की ताकत है।

विद्यार्थियों को संबोधित करने के लिए दिल्ली में सरकारी स्कूलों के 600 तथा केंद्रीय विद्यालयों के 100 छात्र-छात्राओं का चयन मानेकशा ऑडिटोरियम में मोदी को सुनने के लिए किया गया था।

ऑडिटोरियम में इन 700 विद्यार्थियों समेत करीब 1000 लोग मोदी के भाषण को सुन रहे थे। इसके अलावा देशभर में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सुन रहे बच्चों में से करीब 15 विद्यार्थियों के सवालों के जवाब प्रधानमंत्री ने दिए।

दिल्ली में नगर निगम के स्कूलों ने भी भाषण के प्रसारण के पर्याप्त इंतजाम किए। दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने कहा कि 432 स्कूलों में करीब 2.25 लाख बच्चों और 5000 शिक्षकों के लिए मोदी का भाषण सुनने के लिहाज से इंतजाम किए गए थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने कभी क्लास का मॉनीटर बनने की भी नहीं सोची थी, प्रधानमंत्री बनने की बात सोचना तो बहुत दूर की बात है।

शिक्षक दिवस के मौके पर देश के विभिन्न स्कूलों के बच्चों के साथ संवाद के दौरान एक छात्र द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या कभी उन्होंने सोचा था कि वह देश के प्रधानमंत्री बनेंगे और दुनिया में उनका नाम होगा, मोदी ने कहा कि कभी नहीं सोचा क्योंकि मेरी पृष्ठभूमि बहुत सामान्य रही है। मैंने स्कूल में कभी मॉनीटर का चुनाव भी लड़ने के बारे में नहीं सोचा और ऐसा सोचने का (पीएम बनने का) सवाल ही नहीं उठता।

उन्होंने कहा कि पहले से इस तरह की भावनाएं आ जाने से वह बोझ बन जाती हैं, वह संकट में डाल देती हैं और दुखी कर देती हैं कि हाय जो सोचा था, वह हो नहीं पाया।

इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि आजकल छोट़े़ छोटे बच्चों बच्चियों के माता पिता पहले से ही तय कर लेते हैं कि वह क्या बनेंगे। उन्होंने कहा कि वह परिवार में मिलने आने वालों से अपने बच्चों का परिचय ही इस तरह से कराते हैं कि बेटी डॉक्टर बनेगी और बेटा इंजीनियर बनेगा। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से उन बच्चों का बचपना छुप जाता है।

उन्होंने कहा कि 10.11 साल का होते होते गाड़ी लुढ़क जाती है क्योंकि उनमें से बहुत से बच्चों वैसी पढ़ाई नहीं पढ़ पाते और फिर जीवनभर अपने आप को कोसते और गाली देते हैं कि डॉक्टर नहीं बन पाया, इंजीनियर नहीं बन पाया और ऐसा करते हुए वह जो बनते हैं, उसका भी आनंद नहीं ले पाते।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सपने जरूर देखें, लेकिन जीवन के आनंद को नहीं खोएं, कुछ बन गए तो बन गए नहीं बने तो नहीं बने।

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