मेक इन इंडिया का सपना

मेक इन इंडिया का सपना

नयी दिल्ली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को पहली बार संबोधित करते हुये उसे मेक इन इंडिया का सपना तो दिखा दिया है, लेकिन अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) को बढ़ावा दिया बिना इस सपने को हकीकत में बदलना मुश्किल होगा। वर्ष 2009-10 में देश का आरएंडडी बजट सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 0.88 प्रतिशत था जिसे डेढ़ से दो प्रतिशत के बीच पहुंचाये बिना अर्थव्यवस्था को विकास के मार्ग पर ले जाना मुश्किल है। विश्व बैंक के मुताबिक 2011 में आरएंडडी पर भारत का खर्च घटकर जीडीपी का 0.81 प्रतिशत रह गया था। चिंता की बात यह भी है कि यहां होने वाले मूल अनुसंधानों में 75 प्रतिशत से अधिक गैर भारतीय कंपनियां या संस्थाएं करती हैं जिसका लाभ देश के उद्योगों को नहीं मिलता। वर्ष 2010-11 के दौरान देश में पेटेंट के लिए कुल 39400 आवेदन आये जिनमें मात्र 8312 आवेदन भारतीयों द्वारा किये गये थे। इनमें कुल 7509 पेटेंट स्वीकृत किये गये जिसमें 6236 भारतीय आवेदकों को पेटेंट मिले। प्रधानमंत्री ने कहा है कि कंपनियां अपना सामान कहीं भी बेचें पर उन्हें विनिर्माण भारत में करना चाहिये ताकि देश के युवाओं को रोजगार मिल सके जबकि अभी स्थिति यह है कि विदेशी कंपनियां सस्ते में यहां अनुसंधान कर दूसरे देशों में अपने उत्पाद बनाकर महंगे दाम पर वापस हमारे देश में बेच रही हैं। वर्ष 2010 के आंकड़ों के मुताबिक औसतन 10 लाख की आबादी में शोधकर्ताओं की संख्या महज 164 है। इससे जाहिर है कि दोष कहीं न कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक-आर्थिक ढांचे में भी है जो छात्रों को अनुसंधान के क्षेत्र में जाने को प्रेरित नहीं करती। वर्ष 2011-12 में अनुसंधान पर खर्च के लिए कुल 72620.44 करोड़ रुपये का प्रस्ताव किया गया था जिसमें उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान पर महज 2949.76 करोड़ रुपये खर्च किये जाने थे जबकि सबसे ज्यादा खर्च केंद्र तथा राज्य सरकारों को आवंटित किया गया। श्री मोदी ने उद्यमियों से अपील की है कि वे अपने लिए एक-एक खास उत्पाद चुनें जिसके लिए देश आयात पर निर्भर है और उसका निर्माण भारत में शुरू करे। जाहिर है वैश्वीकरण के इस दौर में उनका उत्पाद तभी टिक पायेगा जब कम लागत पर बेहतर गुणवत्ता के साथ उसका निर्माण किया जायेगा। इसके लिए नयी तकनीक की जरूरत होगी जो कोई भी विदेशी कंपनी अपना बाजार खत्म कर हमसे साझा नहीं करेगी। इसलिए अनुसंधान पर निजी कंपनियों को खर्च बढ़ाना होगा, लेकिन अभी अनुसंधान पर होने वाले खर्च में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी छह प्रतिशत से नीचे है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की हिस्सेदारी 30.25 प्रतिशत है। सरकार ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक आरएंडडी में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत करने का आह्वान किया है, लेकिन यह लक्ष्य प्राप्त करना लगभग असंभव प्रतीत होता है। विकास और आरएंडडी पर होने वाले खर्च में क्या संबंध यह समझने के लिए विश्व बैंक के आंकड़े मददगार साबित हो सकते हैं। वर्ष 2013 में प्रति व्यक्ति आय के लिहाज से लग्जमबर्ग, नार्वे और कतर क्रमशः पहले दूसरे और तीसरे स्थान पर थे। लग्जमबर्ग का आरएंडडी पर खर्च उसके जीडीपी का 1.44 प्रतिशत और नार्वे का 1.65 प्रतिशत था हालांकि कतर के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यही तीन देश नहीं दुनिया में जहां भी प्रति व्यक्ति आय अधिक है वहां आरएंडडी पर डेढ़ प्रतिशत या उससे अधिक खर्च किया जाता है। भारत आरएंडडी पर मात्र 0.81 प्रतिशत खर्च करता है और उसकी प्रति व्यक्ति आय 1499 डालर है। हमारा पड़ोसी चीन 1.98 प्रतिशत खर्च करता है और उसकी प्रति व्यक्ति आय (पीसीआई) 6807 डालर है। ब्रिटेन का आरएंडी खर्च 1.72 प्रतिशत और पीसीआई 3935 डालर, अमेरिका का आरएंडी खर्च 2.79 प्रतिशत और पीसीआई 53143 डालर, जर्मनी (2.92 प्रतिशत) की पीसीआई 45085 डालर, सिंगापुर (2.10 प्रतिशत) की पीसीआई 55182 डालर, जापान (3.39 प्रतिशत) की पीसीआई 38492 डालर, फ्रांस (2.26 प्रतिशत) की पीसीआई 41421 डालर, आस्ट्रेलिया (2.84 प्रतिशत) की पीसीआई 67468 डालर और इजरायल (3.93 प्रतिशत) की पीसीआई 36151 डालर है। ये देश अनुसंधान पर भारत के मुकाबले जीडीपी का ज्यादा हिस्सा खर्च करते हैं और नतीजतन उनकी प्रति व्यक्ति आय भी भारत के मुकाबले कई गुना है। इन आंकड़ों के मद्देनजर यह और भी अच्छा होता यदि प्रधानमंत्री अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए भी किसी नीति की घोषणा करते क्योंकि इसके बिना आर्थिक विकास और विशेषकर समावेशी आर्थिक विकास संभव नहीं है।

PM Modi at red fort @ ebiharjharkhand (7)

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