पद्मश्री की असली हकदार हैं मनोरमा दीदी

पद्मश्री की असली हकदार हैं मनोरमा दीदी

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  • 6 हजार गरीब  महिलाओं के जीवन में नया विहानानकर आईं दीदी
  • स्वरोजगार से जोड़कर साको पैरों पर खड़ा किया
  • एबिहर्झार्खंड  परिवार उनके शतायु होने की कामना करता है

डा. सुरेन्द्र की रिपोर्ट: भागलपुर जिले के सबौर, गोराडीह प्रखंडों और सूदूर देहात की करीब 6 हजार गरीब, पिछड़ी, महादलित महिलाओं के जीवन में नया विहान बनकर आई हैं मनोरमा दीदी। महिलाओं का करीब 600 स्वयंसहायता समूह बनाकर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा है, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया है। उनके जीवन को बदल दिया है। यह सब संभव हुआ है सबौर की संस्था सृजन महिला विकास सहयोग समिति के चलते, जिसकी प्रणेता 75 साल की मनोरमा देवी हैं। इस इलाके में छोटे-बड़े सभी उन्हेंं प्यार और सम्मान से ‘दीदी’ कहकर संबोधित करते हैं। मनोरमा का जीवन, उनका संघर्ष किसी वीरांगना से कम नहीं है। रांची में 1991 में उनके पति अवधेश कुमार के असामयिक निधन के बाद उनके जीवन में अंधकार छा गया था। उनके पति रांची में लाह अनुसंधान संस्थान में वरीय वैज्ञानिक के रूप में पदस्थापित थे। उनके नहीं रहने पर छह बच्चों की परवरिश का जिम्मा मनोरमा पर आ गया। अपने संघर्ष यात्रा के दौरान उन्होंने ठेला पर कपड़ा बेचने तक का काम किया जिसे आज भी वे भूली नहीं हैं। संघर्ष के क्रम में 1993-94 में उन्होंने रांची शहर के बाहर सृजन की यात्रा स्वरोजगार के लिए ‘सृजन’ नामक संस्था बनाई। लेकिन अपने शहर का मोह उन्हें भागलपुर खींच लाया। वे सबौर में भाड़े के एक कमरे में सुनीता और सरिता नामक दो महिलाओं के सहयोग से एक सिलाई मशीन रखकर कपड़ा सिलने का काम शुरू किया। रजंदीपुर पैक्स ने 10 हजार रुपए कर्ज दिए। कपड़ें तैयार कर उसे बाजर में बेचा जाने लगा। सिलाई कढाई का काम आगे बढ़ता गया। एक से कई सिलाई मशीनों पर काम होने लगा। महिलाएं भी जुड़ने लगीं। मनोरमा देवी बताती हैं कि उस समय महिलाओं का घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन वे खुद आसपास के गांवों में जा-जाकर महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का मुहिम चलाया। 1996 में सृजन महिला का समिति के रूप में रजिस्ट्रेशन कराया गया। महिलाओं को समिति से जुड़ता देख को सहकारिता बैंक ने 40 हजार रुपए कर्ज दिए। समिति का काम निरंतर बढ़ता रहा। काम से प्रभावित होकर सबौर स्थित ट्रायसम भवन में समिति को अपनी गतिविधियों के आयोजन की अनुमति मिली। बाद में 35 साल की लीज पर यह भवन समिति को मिल गया।

महिलाओं की सृजनशीलता देखनी है तो सबौर आइए

सबौर प्रखंड कार्यालय के पीछे स्थित इस भवन में सृजन की महिलाओं की सृजनशीलता देखने में बनती है। मनोरमा देवी के मार्गदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं सिल्क साड़ी,कपड़े, चादर, बिन्दी, अगरबत्ती पापड़, अचार, मसाला जैसें 100 से अधिक तरह के सामान बना रहीं हैं। महिलाओं के एक से एक पेटिंग, कढ़ाई और दूसरी कारगरी देखकर आप हैरत में पड़ जाएंगे। समिति यहां महिलाओं के लिए लगातार कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन कर रही है। सबौर, गोराडीह प्रखंडों के कई गांवों में सृजन की स्वयंसहायता समूह की महादलित महिलाएं सूप, टोकरी और बांस के सामान, मालाएं बना रही हैं। मवेशी पालन और सब्जी का कारोबार कर रही हैं। कई समूह तो हर mमाह लाखों रुपए का कारोबार कर रही हैं। कई महिलाएं बताती हैं कि कभी वे दाने दाने की मोहताज हुआ करती थी लेकिन आज मनोरमा दीदी की देन है कि उनके पास लाखों की पूंजी भी है। केन्द्रीय सहकारिता विभाग से संबंध सृजन की साखाजत शाखा महिला समूहों को स्वरोजगार के लिए लोन देता है। सृजन के लोन से कई महिला समूहोंं ने अपने कारोबार को काफी आगे बढ़ाया है। मनोरमा देवी कहती हैं कि कई समूह ऐसे हैं जिन्होंने 16 लाख रुपए तक लोन लिया और फिर वापस भी कर दिया। सृजन की प्रेरणा से महिलाएं मेहनत से कमाए अपने पैसों की बचत भी करती हैं और उसे साख बैंक में जमा करती हैं। कई महिलाएं जिनके जीवन को सृजन ने बदल दिया— बताती हैं कि अक्सर देखा जाता है कि जिसका जीवन दुखों में गुजरा हो वे नीरस और बदला लेने वाले स्वभाव के हो जाते हैं लेकिन इसके विपरीत दुख के पहाड़ को लांघ कर आगे बढ़ने वाली मनोरमा दीदी दुखियों का दुख करने वाली के रूप में अपने को ढाला है। वे अपने जीवन में जैसे -जैसे आगे बढ़ती गईं वैसे- वैसे परोपकार,विन्रमता,ममता की प्रतिरूपा बनती गईं। अपने पास आने वाले हर किसी का दुख दूर करना उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया है। दानापुर की सुधा वगर्जी को गरी बच्चों की पढ़ाने लिए पद्म श्री मिला है । यह अच्छी बात है मनोरमा को बहुत पहले ही पद्मश्री मिलना चाहिए। उन्होंने हजारों गरीब महिलाओं को पैरों पर खड़ा कर न केवल उनके जीवन में एक रोशनी बिखेरी है। बल्कि महिला सशक्तीकरण का अनोखा उदाहरण पेश किया है। वे कहती हैं कि अधिक से अधिक महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करना उनका सपना है। भारत सरकार की ओर से उन्हें वित्त राज्य मंत्री अंतरराष्ट्रीय वत्तीय समावेषण सम्मान से नवाज चुके हैं। उन्हें अन्य कई सम्मान और पुरस्कार मिले हैं लेकिन महादलित और कमजोर महिलाओं के लिए जीवन न्योछावर करने वाली अगड़ी जाति की मनारेमा देवी वास्तव मेें पद्म श्री की हकदार हैं।  एबिहर्झार्खंड परिवार उनके शतायु होने की कामना करता है।

2 Responses to "पद्मश्री की असली हकदार हैं मनोरमा दीदी"

  1. b k   September 13, 2014 at 12:58 am

    Smt Manorama Devi really deserve padam shree, at age of 70 still she is providing self employment to 6000 women. We salute her for noble cause.

    • Vikas   September 14, 2014 at 3:08 pm

      Thanks for Your Compliments

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