दीदी की समिति – सृजन महिला विकास सहयोग समिति

दीदी की समिति – सृजन महिला विकास सहयोग समिति

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”..आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती, कोशिष करने वालों की हार नहीं होती”! सदियों पूर्व कवि हरिवंश की लिखी इन पंक्तियों की सार्थकता आज भी समाज को विकास का राह दिखाती है। दो दशक पूर्व 1996 में सबौर में सृजित हुए सृजन की सफलता का आभास शायद ही किसी को रहा हो। एक समिति जो आज 6000 से अधिक ग्रामीण महिलाओं की आवाज बन चुकी है। किसी विशाल वट वृक्ष सदृश मजबूती से महिलाओं के उत्थान पर केंद्रित इस संस्था का सफर इतना आसान नहीं था। समय के साथ संघर्षों को पीछे छोड़कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने वाली इस सख्शियत को दीदी के नाम से लोग जानते हैं। दीदी की समिति- सृजन महिला विकास सहयोग समिति फर्श से उठकर आज प्रतिमाह लाखों का कारोबार कर रही है।

सृजन महिला समिति महिलाओं से, महिलाओं द्वारा, महिलाओं के लिए स्थापित एक संगठन है। यह एक अनवरत प्रवाह है जो बिहार के गौरवमयी इतिहास को चार-चाँद करता है। ग्रामीण विकास विभाग, बिहार सरकार द्वारा सृजन को प्रदान किया गया ग्रेड “।“ का प्रमाण पत्र इस प्रवाह को स्वीकारता है।
समिति की संस्थापिका मनोरमा देवी (दीदी) बताती हैं कि 1991 में पति की अकाल मृत्यु के बाद जीवन काफी कठिन हो गया था। अपनी आर्थिक तंगी को दूर करने के साथ ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबन बनाने का यह शुरूआती दौर काफी संघर्षपूर्ण रहा। उस दौर में जब महिलाओं को घर से बाहर काम करने की मनाही थी। समाज में यह नगवार था, अपने पति के देहांत के बाद बच्चों की देखभाल का जिम्मा भी मेरे ऊपर था। प्रकृति का स्वभाव होता है हर तबाही के बाद सृजन करना। 1993-94 में सृजन की शुरूआत रांची शहर से की। मगर अपने शहर का अपनापन भागलपुर खींच लाया। फिर सुनिता और सरिता इन दो महिलाओं के साथ मिलकर सृजन को समिति के रूप में स्थापित किया। दूसरों के दुख को दूर कर स्वरोजगार लाने के लिए निरंतर प्रयास करती रही। दूसरों का दुख दूर करने से अपना दुख कम होता गया। सबौर प्रखंड में ही एक छोटा से कमरा किराये पर लेकर समिति से महिलाओं को जोड़ने का सिलसिला प्रारंभ हुआ। शुरूआत में एक सिलाई मषीन खरीदकर वस्त्रों को सिलना और बाजार से जोड़ने का कार्य किया गया। सिलाई-कढ़ाई के कारोबार में गांव की महिलाओं को जोड़ना शुरू किया। पर किसी भी कारोबार की शुरूआत में पूंजी की जरूरत पड़ती है। रजन्दीपुर पैक्स ने सहयोग किया और 10 हजार रूपये उधार दिये। इस थोड़े से रकम से काफी मदद मिली और समिति का कारोबार चल निकला। 1996 में समिति का पंजीयन कराया गया। इस दौरान समिति से ग्रामीण महिलाओं के जुड़ने का सिलसिला जारी रहा। लगातार महिलाओं को जुड़ता देख को-आॅपरेटिव बैंक द्वारा समिति को 40 हजार रूपया कर्ज के रूप में प्रदान किया गया।
फिर क्या था समिति अपने कार्यों के साथ लक्ष्य की तरफ निरंतर बढ़ती रही। इस बीच सबौर स्थित ट्राइसम भवन से समिति को अपने गतिविधियों को आयोजित करने की अनुमति मिली। साथ ही लीज पर 35 साल के लिये भवन समिति को मिला। इसने समिति को अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से बढ़ने को प्रेरित किया। आज इसी भवन को लोग सृजन भवन के नाम से जानते हैं। सबौर प्रखंड परिसर के पीछे स्थित इस भवन में महिलाएँ कई तरह के उद्योगों को सृजित कर रही है जिससे समिति के साथ-साथ इससे जुड़ी महिलाओं की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सके। जमा-बचत साख प्रभाग से जुड़ा महिलाओं के खुद की बैंकिंग प्रणाली जो उनमें जमा-बचत का आदत डालता है। जिससे अपने भविष्य के कई आर्थिक परेषानियों से छुटकारा मिल सके। इस प्रभाग से हजारों महिलाएं जुड़ चुकी हैं। इसके अतिरिक्त समिति से जुड़ी महिलाएं बड़े पैमाने पर सिल्क साड़ी, कपड़े, स्वेटर, चादर, ब्लाउज, पापड़, आचार, बिन्दी, कपड़े के पर्स, अगरबत्ती आदि का निर्माण कर रही है।
समिति द्वारा महिलाओं के बीच लगातार कौशल प्रशिक्षणों का आयोजन किया जाता है जिससे महिलाएं अपने को हुनरमंद बना सके और सही रूप में नारी सशक्तिकरण की मिशाल कायम कर सके। आज समिति से जुड़ी महिलाओं को उसके समाज में एक सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता है और उनके प्रयासों की सराहना की जाती है।

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